प्राकृतिक आपदा से निपटना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त (पहाड़ी) डंगवाल
उत्तराखंड, जिसे सदियों से ‘देवभूमि’ के रूप में जाना जाता है, आजकल ‘आपदा प्रदेश’ के रूप में पहचाना जाने लगा है। यह एक अत्यंत पीड़ादायक और चिंताजनक स्थिति है। बीते चार दशकों में इस प्रदेश ने ऐसी अनेक आपदाओं का सामना किया है, जिनमें जन-धन की अपार हानि हुई।
वर्ष 1991 का उत्तरकाशी भूकंप, 1998 का मालपा भूस्खलन, 2013 की केदारनाथ त्रासदी और अब 5 अगस्त 2025 को धराली-हर्षिल क्षेत्र में आई भीषण आपदा — ये सभी घटनाएं न केवल प्रकृति की चेतावनी हैं, बल्कि हमारी नीतिगत विफलताओं और मानवीय लापरवाहियों की भी करुण गाथा हैं।

हिमालय की संवेदनशीलता और पर्यावरणीय असंतुलन
हिमालय विश्व की सबसे युवा और सबसे संवेदनशील पर्वतमालाओं में से एक है। इसकी भूगर्भीय संरचना अस्थिर है, और यहां की पास्थितिकी अत्यंत नाजुक संतुलन पर टिकी है।
बदलते वैश्विक मौसम, जलवायु परिवर्तन और लगातार हो रहे अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप इस संतुलन को खतरनाक रूप से बिगाड़ रहे हैं।
हर वर्ष मानसून के दौरान भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़ और भूधंसाव की घटनाएं अब एक सामान्य समाचार बन चुकी हैं। लेकिन यह प्रश्न भी अब मुखर होकर सामने आता है: क्या ये केवल ‘दैविक’ आपदाएं हैं? उत्तर स्पष्ट है — नहीं।
राजनीतिक उपेक्षा और अनियोजित विकास
उत्तराखंड में जो विनाश हम देख रहे हैं, वह केवल प्रकृति का क्रोध नहीं, बल्कि सरकारों की आपराधिक लापरवाही और अंधाधुंध तथाकथित विकास की साजिश है।

नेशनल हाईवे प्राधिकरण (NHAI) द्वारा सलाहकार समितियों के मानकों से अधिक चौड़ी सड़कें, पहाड़ों को काटकर सुरंगों का निर्माण, नदियों के किनारे बहुमंजिला होटल और इमारतें — यह सब हिमालयी भूगोल को नष्ट करने वाले निर्णय हैं।
विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों की चेतावनियां बार-बार अनसुनी की गईं। ऐसे में जब गांव धंसते हैं, सड़कें टूटती हैं, लोग दब जाते हैं, तो इसके लिए प्रकृति से पहले जिम्मेदार वे नीति-निर्माता हैं जिन्होंने लालच और राजनीतिक लाभ के लिए उत्तराखंड के भविष्य से खिलवाड़ किया।
कांग्रेस और भाजपा की सामूहिक जिम्मेदारी
उत्तराखंड में अब तक सत्ता में रही राष्ट्रीय पार्टियां, कांग्रेस और भाजपा ने प्रदेश की प्रकृति, संस्कृति और अस्मिता को बर्बाद कर दिया है। दोनों ही दलों ने अपने-अपने कार्यकाल में विकास के नाम पर विनाश को बढ़ावा दिया।
पर्यावरणीय जांच के बिना परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई, स्थानीय लोगों की राय को महत्व नहीं दिया गया, और पारदर्शिता व जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है।

धराली और हर्षिल
हाल ही में आई धराली और हर्षिल क्षेत्र की आपदा ने फिर से हमारे सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में कोई भी बड़ा निर्माण कार्य कितना घातक हो सकता है।
स्थानीय ग्रामीण, जो दशकों से यहां के निवासी हैं, वे बेघर हो गए हैं। फसलें तबाह हुईं, आवागमन ठप हो गया, और दर्जनों लोगों की जान चली गई। राहत कार्य शुरू हुए पर सरकार प्रकृति के सामने एक बार फिर बेबस और असहाय नजर आई।
पूर्व सैनिकों की भूमिका
ऐसे समय में, जब राजनीतिक तंत्र और नौकरशाही निष्क्रिय प्रतीत होते हैं, वहां पूर्व सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों के समुदाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
हमारा प्रशिक्षण, अनुशासन और नेतृत्व की क्षमताएं हमें आम नागरिकों से अलग बनाती हैं। हमें अब केवल अपने संगठनों की बैठकों और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यह समय है कि हम आगे बढ़कर पीड़ितों की मदद करें — राशन, कपड़े, तिरपाल, दवाइयां, श्रमशक्ति और मानसिक संबल के रूप में कार्य करें।
हम सबको चाहिए कि अपने-अपने आंतरिक मतभेद और संगठनात्मक सीमाएं भूलकर एक ‘आपदा सहायता समिति’ का गठन करें।
यह समिति एक संयुक्त संचालन तंत्र के रूप में काम करे, जिसका उद्देश्य राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण में सरकार से स्वतंत्र और तेजी से प्रभावी कार्य करना हो।

देवभूमि की रक्षा का संकल्प
उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, यह हमारी आस्था, अस्मिता और अस्तित्व का केंद्र है। इसके अस्तित्व पर आज संकट मंडरा रहा है — न केवल आपदाओं से, बल्कि राजनीति की विफलता और हमारे अपने मौन से।
हमें अब मौन नहीं रहना है। पूर्व सैनिकों, युवाओं, बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों — सबको मिलकर एक जन आंदोलन खड़ा करना होगा जो प्रकृति की रक्षा, जनकल्याण और सच्चे विकास के लिए समर्पित हो।
मैं सभी से विनम्र आह्वान करता हूं कि धराली और हर्षिल जैसी घटनाएं हमें झकझोरें, जगाएं और जोड़ें — ताकि हम देवभूमि को फिर से उसके असली स्वरूप में देख सकें।
यह लेखक के अपने विचार हैं।

