उत्तरकाशी जलप्रलय: विशेषज्ञों की चेतावनी और त्रासदी के पीछे छिपे संकेत
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद में धराली, हर्षिल और सुक्की टॉप में आई विनाशकारी जलप्रलय ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जिसने भी इस त्रासदी के दृश्य देखे, वह स्तब्ध रह गया।
इस बाढ़ में न केवल भारी जानमाल की हानि हुई है, बल्कि यह घटना राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था और पर्यावरणीय संतुलन को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े करती है।
वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार का राहत एवं बचाव अभियान युद्धस्तर पर जारी है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस त्रासदी को रोका या नुकसान को कम किया जा सकता था?

बादल फटा या कुछ और था? विशेषज्ञों की राय
5 अगस्त, 2025 को आई इस आपदा के पीछे कारणों को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति है। स्थानीय लोग इसे बादल फटने की घटना बता रहे हैं, परंतु मौसम विभाग के आंकड़े इसे नकारते हैं।
विभाग के अनुसार, उस दिन केवल 8-10 मिमी वर्षा हुई, जबकि बादल फटने के लिए एक घंटे में कम से कम 100 मिमी वर्षा की आवश्यकता होती है।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के पूर्व ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. डोभाल का कहना है कि ‘धराली एक फ्लड प्लेन में स्थित है। वहां पानी की गति आरंभ से ही अत्यंत तीव्र थी, जो सामान्य बादल फटने की घटना से भिन्न है।
यह संकेत करता है कि संभवतः ऊपर के जंगलों में कोई अस्थायी झील या पानी का जमाव अचानक टूटा। पानी का काला रंग और मलबा इस संभावना को बल देते हैं कि यह घटना किसी जमे हुए हिस्से के टूटने से उत्पन्न हुई थी।’
उन्होंने इस घटना की तुलना 2021 के चमोली आपदा से की, जिसमें एक झील का जमा मलबा अचानक बह गया था।

धरती की चेतावनी: हिमालय की नाजुकता
वरिष्ठ भूविज्ञानी डॉ. मनीष मेहता बताते हैं कि ‘उत्तरकाशी की धराली घाटी में खीरगंगा नदी का उफान और मलबा प्रवाह इस क्षेत्र की भूगर्भिक संवेदनशीलता को उजागर करता है।
यहां की घाटियां संकरी, ऊंची और ढालदार हैं, जो इसे प्राकृतिक आपदाओं के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं।’
उनके अनुसार, हिमालय दुनिया की सबसे युवा और टेक्टोनिक रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यहां भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियर झील विस्फोट और अचानक बाढ़ जैसी आपदाएं सामान्य होती जा रही हैं।
इसके पीछे तेजी से हो रहा जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक मानसूनी वर्षा और ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना बड़ी वजहें हैं।
बढ़ती बादल फटने की घटनाएं
डॉ. नरेंद्र सिंह, वरिष्ठ वायुमंडलीय एवं पर्यावरण वैज्ञानिक, एरीज (नैनीताल) के अनुसार ‘धराली की भौगोलिक बनावट — सीधी खड़ी ऊंची पहाड़ियां और उनके बीच ठहरते बादल, बादल फटने के लिए उपयुक्त स्थितियां उत्पन्न करती हैं।
पिछले डेढ़ दशक में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाओं में तेज़ी से वृद्धि हुई है।’
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धराली की घटना में वर्षा की मात्रा बादल फटने के स्तर की नहीं थी, लेकिन क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता के चलते नुकसान अधिक हुआ।

खीरगंगा: शांत लेकिन घातक नदी
धराली के पास बहने वाली खीरगंगा नदी, जो कि श्रीकंठ पर्वत से निकलती है और भागीरथी से मिलती है, का इतिहास विनाशकारी रहा है।
19वीं सदी में खीरगंगा की बाढ़ ने कल्पकेदार मंदिर समूह (240 मंदिर) को नष्ट कर दिया था। इनका उल्लेख ब्रिटिश यात्री जेम्स विलियम फ्रेजर ने भी 1816 में किया है।
2013 और 2018 में भी इसी नदी ने भारी तबाही मचाई, जिससे गंगोत्री हाईवे तक प्रभावित हुआ।
अनियोजित निर्माण ने बढ़ाया संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नदियों से कम से कम 30 मीटर की दूरी पर निर्माण नियमों का पालन किया जाता, तो नुकसान कम हो सकता था। लेकिन उत्तराखंड में ‘रिवर व्यू’ के नाम पर नदियों के बिलकुल किनारे होटलों, होमस्टे और दुकानों का निर्माण आम बात बन चुका है।
केदारनाथ आपदा (2013) में भी अनियोजित विकास और अनदेखी ने ही त्रासदी को विकराल रूप दिया था। भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में बिना भूगर्भीय अध्ययन के बहुमंज़िला इमारतें बन रही हैं, जो जानलेवा साबित हो रही हैं।

पूर्व चेतावनी प्रणाली की कमी
धराली की आपदा ने एक बार फिर 2013 की केदारनाथ त्रासदी की दर्दनाक यादें ताजा कर दीं। तब भी यह कहा गया था कि ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (EWS) लगाए जाएंगे, ताकि भविष्य में नुकसान को रोका जा सके। लेकिन 12 वर्षों बाद भी यह व्यवस्था कागजों से आगे नहीं बढ़ सकी।
2021 में चमोली की रैणी आपदा के बाद भी ये मुद्दा उठा, पर कोई ठोस कार्यान्वयन नहीं हो सका। अगर धराली में अर्ली वार्निंग सिस्टम होता, तो शायद जान-माल की हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
यह चेतावनी है, संयोग नहीं
उत्तरकाशी की यह आपदा कोई अनहोनी नहीं थी, बल्कि यह हिमालयी क्षेत्र में फैल रही मानवीय लापरवाहियों और जलवायु परिवर्तन की संयुक्त चेतावनी है।
यह त्रासदी बताती है कि हमें अपने विकास मॉडल की समीक्षा करनी होगी, प्राकृतिक नियमों का सम्मान करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण, वैज्ञानिक चेतावनियों को नजरअंदाज करना बंद करना होगा।
जब तक हम इन बातों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्यों में हर मानसून एक नई तबाही की कहानी लेकर आएगा।

