नदी के व्यवहार को समझना क्यों है ज़रूरी
प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट, विभागाध्यक्ष (भूविज्ञान विभाग), एच.एन.बी. गढ़वाल विश्वविद्यालय
धराली की घटना ने एक बार फिर मुझे अपने विषय के उस पहले पाठ को याद करने पर मजबूर कर दिया, जिसे मैंने बी.एससी. प्रथम वर्ष में पढ़ा था। इसके फायदे और नुकसान की समझ एम.एस.सी. तथा शोध कार्य के दौरान धीरे-धीरे गहराती गई।
अगर हम इस भू-आकृति को सामान्य भाषा में समझें तो जलोढ़ पंख एक प्रकार की भूगर्भिक संरचना है, जो तब बनती है जब कोई नदी या धारा अपने साथ लाए गए अवसादों को जमा करती है।
इससे एक पंखे के आकार की संरचना बन जाती है। यह प्रक्रिया तब होती है जब नदी की गति कम हो जाती है और उसमें अवसादों को जमा करने की क्षमता बढ़ जाती है।
यह संरचना सामान्यतः नदी या धारा के मुहाने पर बनती है। उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में ऐसे उदाहरण एक-दो नहीं, बल्कि हज़ारों हैं। क्योंकि यहां नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र हिमाच्छादित हैं, जहां ग्लेशियरों द्वारा लाखों-करोड़ों टन मलबा (हिमोढ़) जमा होता है।

हम उत्तराखंड की किसी भी घाटी में जाएं – चाहे वह अलकनंदा हो, उसकी सहायक नदियां हों, या फिर भागीरथी, यमुना अथवा भारत की कोई और पर्वतीय नदी – सभी की सहायक नदियां अपने ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र से भूमि कटाव के कारण भारी मात्रा में मलबा निचली घाटियों में तीव्र वेग से लाती हैं।
जैसे ही इन घाटियों का ढाल कम होता है, नदी की वहन क्षमता घट जाती है और यह मलबा पंखे के आकार में जमा होकर जलोढ़ पंख बनाता है।
उदाहरण के लिए, मेरे द्वारा लिए गए कुछ छायाचित्र – जिनमें इसरो द्वारा लिया गया धराली (भागीरथी नदी के बाएं छोर पर खीर गंगा द्वारा निर्मित फैन) का उपग्रह चित्र, धौलीगंगा के गांखुयी गाढ़ के मुहाने के विभिन्न समयों पर लिए गए चित्र, तथा हाल ही के लेह-लद्दाख भ्रमण के दौरान श्योक नदी के किनारे स्थित सती गांव का विशाल जलोढ़ पंख – ये सभी इस बात को दर्शाते हैं कि किस प्रकार रेत, मिट्टी और बजरी जैसे अवसाद समय के साथ जमा होते हैं।
नदी की धारा में परिवर्तन के साथ-साथ इन संरचनाओं के आकार और स्वरूप में भी समयानुसार बदलाव आता रहता है।
भूविज्ञान के छात्र के रूप में हम जलोढ़ पंखों का अध्ययन, भूगर्भिक प्रक्रियाओं और नदी के व्यवहार को समझने के लिए करते हैं।
देखा गया है कि हमारे पूर्वजों ने इन भू-आकृतियों का उपयोग कृषि हेतु करना शुरू किया था, क्योंकि इन क्षेत्रों की मिट्टी अत्यंत उपजाऊ होती है और पानी की उपलब्धता भी पर्याप्त रहती है। इसलिए पहाड़ों की अधिकांश सिंचित खेती इन्हीं जलोढ़ पंखों अथवा नदी के किनारे बनी रिवर टेरेस पर होती है।
यहां तक तो भूमि का उपयोग संतुलित और उचित था। परंतु समय के साथ जैसे-जैसे मनुष्य कष्टों से दूर होता गया, उसने पहाड़ों पर चलना बंद कर दिया और अब सुगमता के लालच में घाटियों में बनी इन भू-आकृतियों पर निवास करने लगा।
प्रकृति की इन संरचनाओं का भान होते हुए भी मनुष्य यहां बसने लगा। फिर विकास की अंधी दौड़ में, सरकारों ने भी अपने स्वार्थों के लिए इन नदी-नालों में सरकारी या गैर-सरकारी निर्माण शुरू कर दिए। इसका परिणाम यह हुआ कि आज हमें हर साल धराली, स्याग्री जैसे सैकड़ों गांवों से हाथ धोना पड़ रहा है।
अब भी समय है। हर व्यक्ति को – चाहे वह नीति निर्माता हो, राजनेता हो या सामाजिक कार्यकर्ता – अपनी समझ बढ़ानी होगी। हमें अपने पूर्वजों के अनुभवों और वैज्ञानिकों की सलाह को गंभीरता से लेना होगा।
अन्यथा, एक ओर जहां वैश्विक पर्यावरण में तेज़ी से बदलाव हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, न केवल पहाड़ों में रहने वाले, बल्कि मैदानों में भी नदी तल को कब्जाने वाले लोगों का अंत निश्चित है…!

