जहां संसाधन कम थे, वहां हौसले बड़े थे: बलवंत सिंह रावत की प्रेरक कहानी
देवप्रयाग विकासखंड के भ्वींट गांव से निकले बलवंत सिंह रावत की सफलता केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ और उसके युवाओं की सामूहिक उम्मीद की जीत है। ऐसे समय में जब संसाधनों की कमी, बेरोज़गारी और पलायन पहाड़ी समाज की सबसे बड़ी चुनौतियां बन चुकी हैं, बलवंत सिंह रावत की कहानी यह साबित करती है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, यदि संकल्प अडिग हो तो रास्ते स्वयं बन जाते हैं।
उत्तराखंड पुलिस भर्ती में होमगार्ड कोटे से पूरे प्रदेश में रैंक–1 हासिल करना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, कठोर अनुशासन और गहरा आत्मसंयम छिपा है। वर्ष 2019 में, जब ब्लॉक स्तर पर सैकड़ों अभ्यर्थियों के बीच केवल एक ही सीट उपलब्ध थी, तब बलवंत सिंह रावत ने उसी एक अवसर को अपनी मेहनत से हासिल किया और होमगार्ड सेवा में चयनित हुए। इसके बाद उन्होंने पांच वर्षों तक पूरी निष्ठा और ईमानदारी से ड्यूटी निभाई, साथ ही अपने बड़े लक्ष्य की तैयारी भी निरंतर जारी रखी।
ड्यूटी के बाद किताबें खोलना, थकान के बावजूद अभ्यास करना, बार-बार असफलताओं का सामना करना और फिर भी हार न मानना—यही वह तपस्या है जिसने उन्हें शिखर तक पहुंचाया। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि चयन सूची में नाम आने से पहले एक लंबा, कठिन और अक्सर अदृश्य संघर्ष होता है, जिसे समाज प्रायः देख नहीं पाता।
बलवंत सिंह रावत की कहानी उन हजारों युवाओं के लिए आईना है, जो संसाधनों की कमी को अपनी असफलता का कारण मान लेते हैं। यह कहानी बताती है कि साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं होती। यदि मेहनत ईमानदार हो और धैर्य स्थायी, तो गांव से निकलकर भी प्रदेश स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है।
आज, जब पहाड़ का युवा हताशा और असमंजस के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में बलवंत सिंह रावत जैसे उदाहरण समाज को नई दिशा और नई ऊर्जा देते हैं। उनकी सफलता हमें यह याद दिलाती है कि उत्तराखंड का भविष्य आज भी उसके युवाओं के हाथों में है—ज़रूरत है केवल विश्वास, परिश्रम और निरंतर प्रयास की।

