बसंत पंचमी: प्रकृति की गोद में संस्कृति का उत्सव
उत्तराखंड में बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और मानवीय भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ उत्सव है। यह पर्व शीत ऋतु के समापन और बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। जैसे ही पहाड़ों में जमी बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगती है और खेत-खलिहानों में नई हरियाली की आहट सुनाई देती है, वैसे ही लोगों के मन में भी नई ऊर्जा और उल्लास का संचार होने लगता है।
बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा का विशेष महत्व है। मां सरस्वती को विद्या, बुद्धि, कला, संगीत और ज्ञान की देवी माना जाता है। उत्तराखंड की संस्कृति में शिक्षा और संस्कारों को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, इसलिए यह पर्व यहां पूरे श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस दिन कई परिवार अपने बच्चों का विद्यारंभ संस्कार कराते हैं, जिससे बच्चे के जीवन की शिक्षा यात्रा का शुभारंभ माना जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बसंत पंचमी का स्वरूप और भी प्राकृतिक दिखाई देता है। किसान अपने खेतों में जाकर अच्छी फसल, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। कई स्थानों पर हल जोतने और बीज बोने से पहले भूमि और देवताओं की पूजा करने की परंपरा है। यह परंपरा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सम्मान को दर्शाती है।
इस दिन लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं और घरों तथा मंदिरों को पीले फूलों से सजाया जाता है। पीला रंग ऊर्जा, आशा, उल्लास और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पहाड़ों में सरसों के पीले फूलों से ढकी ढलानें मानो बसंत पंचमी के उत्सव को और भी जीवंत बना देती हैं।
कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में बसंत पंचमी से ही होली की बैठकों की शुरुआत हो जाती है। गांव-गांव में लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। झोड़ा, चांचरी और चौनफुला जैसे पारंपरिक लोकनृत्य और गीतों का आयोजन किया जाता है, जिनमें लोगों की सामूहिक सहभागिता देखने को मिलती है। कुछ क्षेत्रों में पतंग उड़ाने की परंपरा भी प्रचलित है, जो खुले आकाश और स्वतंत्रता के भाव को दर्शाती है।
घरों में इस अवसर पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। हलवा, खीर, पीले चावल और अन्य पारंपरिक पकवान त्योहार की मिठास को और बढ़ा देते हैं। परिवार और पड़ोसी मिलकर इन व्यंजनों का आनंद लेते हैं, जिससे सामाजिक मेल-जोल और आपसी प्रेम मजबूत होता है।
वास्तव में, बसंत पंचमी प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को दर्शाने वाला पर्व है। यह नई शुरुआत, आशा, सकारात्मकता और ज्ञान के प्रकाश का संदेश देता है। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में बसंत पंचमी आज भी पूरे उत्साह, श्रद्धा और परंपरागत गरिमा के साथ मनाई जाती है और पीढ़ी दर पीढ़ी इस सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए हुए है।

