लोकसंस्कृति के स्वर साधक जीत सिंह नेगी का शताब्दी समारोह शुभारंभ
उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के युगपुरुष, स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की 99वीं जयंती की पूर्व संध्या पर उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा डीपीएमआई सभागार, न्यू अशोक नगर, दिल्ली में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नेगी जी के गीतों, संस्मरणों और उनके सांस्कृतिक अवदान को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया।
समारोह के दौरान उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा विगत वर्ष आयोजित भाषा शिक्षण कक्षाओं के केंद्र प्रमुखों एवं सहयोगियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में समाज के अनेक विद्वान, साहित्यकार, कलाकार एवं सांस्कृतिक चिंतक उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली वर्ष 2016 से निरंतर गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्य कर रहा है। मंच का प्रमुख उद्देश्य बच्चों और युवाओं को उनकी मातृभाषाओं से जोड़ना है। इस दिशा में मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी, उनके साहित्यकार साथियों तथा डीपीएमआई की टीम, डॉ. विनोद बछेती के नेतृत्व में, निरंतर सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।
मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी ने अपने संबोधन में कहा कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के वटवृक्ष हैं। उन्होंने बताया कि मंच द्वारा जीत सिंह नेगी शताब्दी वर्ष समारोह का शुभारंभ किया जा चुका है, जिसके अंतर्गत पूरे वर्ष नेगी जी के लोक-संसार, गीत, नाटक और सांस्कृतिक योगदान पर विविध आयोजन किए जाएंगे। आगामी वर्ष 2 फरवरी 2027, उनकी 100वीं जयंती के अवसर पर एक विराट आयोजन प्रस्तावित है।

उन्होंने यह भी कहा कि गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होना, स्वर्गीय नेगी जी का एक अधूरा सपना था। नेगी जी का मानना था कि “भाषा बचेगी तो लोक बचेगा”—इसलिए भाषा को सम्मान और संवैधानिक मान्यता मिलना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से मंच दिल्ली और उत्तराखण्ड में शताब्दी वर्ष के अंतर्गत विभिन्न आयोजन करेगा तथा जीत सिंह नेगी शताब्दी समारोह समिति का गठन किया जाएगा।
इस अवसर पर मंच के संरक्षक एवं सुप्रसिद्ध उद्यमी डॉ. विनोद बछेती ने कहा कि नई पीढ़ी को स्वर्गीय जीत सिंह नेगी के कार्यों से परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस दौर में संसाधनों का अभाव था, उस समय नेगी जी ने अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए जो कार्य किया, वह आज भी प्रेरणास्रोत है। आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाएँ।
जीत सिंह नेगी : जीवन और कृतित्व
स्वर्गीय जीत सिंह नेगी का जन्म 2 फरवरी 1927 को ग्राम अयाल, पट्टी पैडुलस्यूँ, जनपद पौड़ी गढ़वाल में सुल्तान सिंह नेगी और श्रीमती रूपदेयी नेगी के घर हुआ। उनका निधन 21 जून 2020 को देहरादून में हुआ।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा कंडारा (पौड़ी) के बेसिक स्कूल से प्राप्त की। उनके पिता ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे और म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) में तैनात थे। पाँचवीं के बाद वे अपने पिता के साथ म्यांमार गए, जहाँ उन्होंने मेमियो से मिडिल तक की शिक्षा पूरी की। इसके पश्चात उनके पिता का स्थानांतरण लाहौर हुआ, जहाँ से उन्होंने जुगल किशोर पब्लिक स्कूल, लाहौर से मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की। बाद में वे अपने गाँव लौट आए और पौड़ी के गवर्नमेंट कॉलेज से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण किया।
जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड के ऐसे पहले लोकगायक थे जिनका एलपी ग्रामोफोन रिकॉर्ड वर्ष 1949 में जारी हुआ। उस समय लोक संगीत का रिकॉर्ड बनना एक असाधारण घटना थी। इस रिकॉर्ड में उनके छह गीत शामिल थे, जो उनकी गायन प्रतिभा और लोकप्रियता को दर्शाते हैं।

वे न केवल एक महान लोकगायक थे, बल्कि उत्कृष्ट संगीतकार, निर्देशक और रंगकर्मी भी थे। उन्होंने मुंबई में मूवी इंडिया की फिल्म ‘खलीफा’ (1949) तथा मून आर्ट पिक्चर्स की फिल्म ‘चौदहवीं रात’ में सहायक निर्देशक के रूप में कार्य किया। वे नेशनल ग्रामोफोन रिकॉर्डिंग कंपनी में सहायक संगीत निर्देशक भी रहे।
उनके प्रसिद्ध नाटकों और गीत-नाटिकाओं में ‘मलेथा की कूल’, ‘रामी बौराणी’, ‘भारी भूल’, ‘राजू पोस्टमैन’ और ‘जीतू बगड़वाल’ प्रमुख हैं। ‘भारी भूल’ उनका पहला नाटक था।
उनका प्रसिद्ध खुदेड़ गीत—
“तू होली ऊँची डांड्यूँ मा बीरा,
घसियारी का भेष मा…”
1950 के दशक की शुरुआत में आकाशवाणी से प्रसारित हुआ और देखते ही देखते देश-विदेश में बसे प्रवासी उत्तराखण्डियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हो गया।
जीत सिंह नेगी की प्रमुख प्रकाशित कृतियों में गीत गंगा, जौंल मगरी, छम घुंघरू बाजला (गीत संग्रह), मलेथा की कूल, भारी भूल, जीतू बगड़वाल, रामी, पतिव्रता रामी, राजू पोस्टमैन तथा एल्बम रवांई की राजुला शामिल हैं।
उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान सहित लोकरत्न (1962), गढ़रत्न (1990), दूनरत्न (1995), मील का पत्थर (1999), मोहन उप्रेती लोक संस्कृति पुरस्कार (2000) तथा डॉ. शिवानंद नौटियाल स्मृति सम्मान (2011) जैसे अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया।
इस अवसर पर पूर्वी दिल्ली के पूर्व जिलाधिकारी कुलानंद जोशी, उद्यमी आदित्य घिल्डियाल, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार मदन मोहन सती, वरिष्ठ साहित्यकार रमेश चंद्र घिल्डियाल ‘सरस’ सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

