उत्तराखंड के पहले अरबपति दान सिंह ‘मालदार’ की अद्भुत गाथा
देश के बड़े उद्योगपतियों के नाम अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन उत्तराखंड की धरती ने भी एक ऐसे व्यक्तित्व को जन्म दिया, जिनकी सफलता की कहानी किसी किंवदंती से कम नहीं। यह कहानी है दान सिंह बिष्ट की, जिन्हें लोग सम्मानपूर्वक दान सिंह ‘मालदार’ के नाम से जानते थे।
घी बेचने से अपने जीवन की शुरुआत करने वाला यह साधारण बालक आगे चलकर उत्तराखंड का पहला अरबपति बना और ‘टिम्बर किंग ऑफ इंडिया’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
बचपन की कठिनाइयों ने गढ़ा व्यक्तित्व
दान सिंह बिष्ट का बचपन अभावों में बीता। आर्थिक तंगी ने उनके सामने कई चुनौतियां खड़ी कीं, लेकिन इन परिस्थितियों ने उन्हें कमजोर नहीं किया, बल्कि और अधिक संघर्षशील बनाया। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े इस बालक ने कम उम्र में ही जीवन की कठोर सच्चाइयों को समझ लिया था।
मूल रूप से नेपाल के बैतड़ी जिले के निवासी दान सिंह बिष्ट बाद में पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गांव में आकर बस गए। मात्र 12 वर्ष की आयु में वे एक ब्रिटिश व्यापारी के साथ बर्मा पहुंचे। यही वह मोड़ था, जहां से उनके जीवन की दिशा बदलनी शुरू हुई। विदेश में व्यापारिक गतिविधियों को निकट से देखने का अनुभव उनके लिए भविष्य की नींव साबित हुआ।
घी के व्यापार से उद्योग जगत तक
भारत लौटने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ घी का व्यापार शुरू किया। छोटे स्तर से प्रारंभ हुआ यह व्यवसाय धीरे-धीरे विस्तृत होता गया। अपनी सूझबूझ, जोखिम उठाने की क्षमता और दूरदर्शिता के बल पर उन्होंने लकड़ी, चाय बागान और अन्य क्षेत्रों में निवेश किया।
लकड़ी के व्यापार में उनका ऐसा प्रभाव स्थापित हुआ कि उन्हें ‘टिम्बर किंग ऑफ इंडिया’ कहा जाने लगा। उनका व्यापारिक नेटवर्क जम्मू-कश्मीर से लेकर लाहौर और पठानकोट से वजीराबाद तक फैला हुआ था। पिथौरागढ़, टनकपुर, हल्द्वानी और नैनीताल के अलावा असम और मेघालय में भी उनकी उल्लेखनीय संपत्तियां थीं। उनके चाय बागानों की उपज यूरोप तक निर्यात होती थी और वहां विशेष मांग रखती थी।
ऐतिहासिक सौदा और बढ़ती प्रतिष्ठा
सन् 1945 में उन्होंने मुरादाबाद के राजा गजेन्द्र सिंह की जब्त संपत्ति 2,35,000 रुपये में खरीदकर व्यापार जगत में सनसनी फैला दी। उस दौर में यह राशि अत्यंत बड़ी मानी जाती थी। इस सौदे ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और उनकी आर्थिक शक्ति को स्थापित किया।
कहा जाता है कि उनकी संपत्ति भारत की सीमाओं से निकलकर नेपाल तक फैली हुई थी। उन्होंने कई गांवों और रजवाड़ी संपत्तियों का अधिग्रहण किया, जिससे उनका व्यापारिक साम्राज्य और अधिक सुदृढ़ हुआ।
समाजसेवा में भी अग्रणी
दान सिंह बिष्ट केवल एक सफल उद्योगपति ही नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवी भी थे। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया और कई विद्यालयों की स्थापना में सहयोग किया। स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराकर उन्होंने क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान किया। उनके प्रयासों से अनेक परिवारों को स्थायी आजीविका मिली।
विरासत जो आज भी प्रेरणा देती है
10 सितंबर 1964 को दान सिंह बिष्ट का निधन हो गया। उनका कोई पुत्र नहीं था, लेकिन उनकी विरासत आज भी उत्तराखंड की स्मृतियों में जीवित है। संघर्ष, साहस और संकल्प की यह कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियां सफलता की राह में बाधा नहीं, बल्कि प्रेरणा बन सकती हैं।
उत्तराखंड के इतिहास में दान सिंह ‘मालदार’ का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में, जिन्होंने साधारण शुरुआत से असाधारण उपलब्धियों तक का सफर तय किया। उनकी जीवनगाथा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और ईमानदार परिश्रम से कोई भी शिखर दूर नहीं।

