पंतनगर में प्राकृतिक खेती पर मंथन, 800 किसानों की सहभागिता
पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद के संयुक्त तत्वावधान में एक-दिवसीय क्षेत्रीय वृहद प्राकृतिक खेती परामर्श-सह-कार्यशाला का आयोजन गांधी हॉल में किया गया। कार्यशाला में उत्तराखंड के विभिन्न जनपदों से लगभग 800 किसानों सहित वैज्ञानिक, विद्यार्थी एवं कृषि विशेषज्ञों ने सहभागिता की।
कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मनमोहन सिंह चौहान, विशिष्ट अतिथि के रूप में निदेशक, राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद, डॉ. गगनेश शर्मा तथा निदेशक, विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा, डॉ. लक्ष्मीकांत उपस्थित रहे। इसके साथ ही सहायक निदेशक, राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद, डॉ. वाचस्पति पाण्डेय; प्रगतिशील किसान डालचंद; अधिष्ठाता कृषि, डॉ. सुभाष चंद्रा; निदेशक शोध, डॉ. एस. के. वर्मा एवं प्रसार शिक्षा निदेशालय की प्राध्यापक डॉ. निर्मला भट्ट मंच पर उपस्थित रहे।
कार्यशाला के प्रारम्भ में प्राकृतिक खेती पर आधारित कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा लगाए गए स्टॉलों तथा डॉ. सुनीता टी. पाण्डे द्वारा वृक्षायुर्वेद प्राकृतिक खेती केंद्र पर लगाए गए प्रदर्शनों का अतिथियों द्वारा अवलोकन किया गया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रोफेसर मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि विश्वविद्यालय के एलुमनाई देश-विदेश में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, जिस पर हमें गर्व है। वर्ष 1960 में स्थापित यह विश्वविद्यालय शिक्षा और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। यहां वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर विशेष बल दिया जाता है। कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए किसानों, विशेषज्ञों और युवाओं की भागीदारी कृषि के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है।

उन्होंने कहा कि आज की मुख्य चुनौती किसानों की आय बढ़ाना, लागत घटाना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना है। रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए अब समय है कि हम संतुलित और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें। आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक सोच और सतत खेती अपनाकर ही हम भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
विश्वविद्यालय इस दिशा में प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देकर किसानों के साथ खड़ा है। यह केवल एक कार्यशाला नहीं, बल्कि एक साझा अभियान है, जिसका लक्ष्य सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी खेती के साथ 2047 तक एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. गगनेश शर्मा ने कहा कि हरित क्रांति के बाद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक उपयोग से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन मृदा की उर्वरता, ऑर्गेनिक कार्बन और सूक्ष्म जीवों में कमी आई है, जिससे मिट्टी, जल स्रोत और मानव स्वास्थ्य प्रभावित हुए हैं।
इसलिए अब जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाना आवश्यक है, जिसमें गोबर-गोमूत्र जैसे संसाधन मिट्टी की गुणवत्ता सुधारते हैं और लागत घटाते हैं। उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत और सीमित संसाधनों के कारण प्राकृतिक खेती भविष्य की आवश्यकता बन गई है।
इस अवसर पर डॉ. लक्ष्मीकांत ने प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि कृषि के सामने तीन मुख्य चुनौतियां हैं — किसान की आय बढ़ाना, खेती की लागत घटाना और मृदा स्वास्थ्य को सुधारना। मिट्टी एक जीवित प्रणाली है, जिसमें सूक्ष्म जीव फसल उत्पादन को संतुलित रखते हैं। ‘वन हेल्थ’ की अवधारणा के तहत मानव, पशु, पर्यावरण और मृदा सभी का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है।
प्रगतिशील किसान डालचंद ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी उत्पादन लागत में कमी आई है तथा फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। उन्होंने अन्य किसानों को भी इस पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यशाला के प्रारम्भ में निदेशक प्रसार शिक्षा, डॉ. जितेंद्र क्वात्रा ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस दौरान प्राकृतिक खेती जागरूकता कैलेंडर तथा प्राकृतिक खेती पर आधारित पुस्तक का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। साथ ही प्रतिभागियों के लिए प्रश्नोत्तरी सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान विशेषज्ञों द्वारा किया गया।
कार्यशाला के अंत में डॉ. निर्मला भट्ट ने सभी उपस्थितजनों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस कार्यशाला में उत्तराखंड राज्य के विभिन्न जनपदों से लगभग 800 कृषकों सहित बड़ी संख्या में किसान, हितधारक, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, महाविद्यालयों के अधिष्ठाता, निदेशकगण एवं संकाय सदस्य उपस्थित रहे।

