खजान सिंह : जाते-जाते दे गए रोशनी की सौगात

खजान सिंह : जाते-जाते दे गए रोशनी की सौगात

मृत्यु के बाद भी पूरी हुई अंतिम इच्छा, स्वजन ने कराया नेत्रदान; संवेदनाओं के बीच समाज को दे गए मानवीयता का संदेश

मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, लेकिन कुछ लोग अपने जाने के बाद भी दूसरों के जीवन में उम्मीद और उजाला छोड़ जाते हैं।

विकासखंड नौगांव के तुनाल्का गांव निवासी 54 वर्षीय खजान सिंह भी ऐसी ही मानवीय मिसाल छोड़ गए। निधन से पहले उन्होंने अपनी आंखें दान करने की इच्छा जताई थी। उनके निधन के बाद स्वजन ने उनकी अंतिम इच्छा पूरी कर उन्हें सच्चे अर्थों में अमर कर दिया।

खजान सिंह के अचानक निधन से परिवार में शोक की लहर दौड़ गई। घर-आंगन में मातम था और परिजन अपने प्रियजन को खोने के दुख में डूबे थे।

इसी बीच स्वजन को उनकी कही बात याद रही कि मृत्यु के बाद उनकी आंखें दान कर दी जाएं, ताकि उनके जाने के बाद भी किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी आ सके।

परिजनों ने गहरे दुख के बीच संयम दिखाते हुए उनकी अंतिम इच्छा को प्राथमिकता दी और नेत्रदान की प्रक्रिया शुरू कराई।

परमार्थ विजय पब्लिक स्कूल एवं दिव्यांग छात्रावास की प्रबंधिका विजयलक्ष्मी जोशी की प्रेरणा और प्रयासों से यह प्रक्रिया पूरी हो सकी।

विजयलक्ष्मी जोशी ने बताया कि खजान सिंह के निधन की सूचना मिलने के बाद नेत्रदान के लिए हृदयेश अस्पताल से संपर्क किया गया। आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी कर उनकी आंखें दान कराई गईं।

खजान सिंह का नेत्रदान केवल एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि उस संवेदनशील सोच का उदाहरण है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन के बाद भी किसी अनजान इंसान के जीवन में उम्मीद बनकर रहना चाहता है।

परिवार के लिए यह समय असहनीय पीड़ा का था, लेकिन उसी पीड़ा के बीच खजान सिंह की अंतिम इच्छा किसी दूसरे के जीवन में उजाले की संभावना बन गई।

नेत्रदान से प्राप्त आंखें जरूरतमंदों को दृष्टि का उपहार देने में सहायक होती हैं। ऐसे में खजान सिंह की विदाई का यह प्रसंग तुनाल्का गांव ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना की प्रेरक मिसाल बन गया है।

परिवार ने एक प्रियजन को खोया, लेकिन उनकी इच्छा को सम्मान देकर उनके जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाया। खजान सिंह अब परिजनों के बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आंखों से किसी दूसरे जीवन में आने वाला उजाला उनकी स्मृति को लंबे समय तक जीवित रखेगा।

किसी इंसान की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होती कि उसने जीवन में क्या हासिल किया, बल्कि इससे भी होती है कि उसके जाने के बाद वह दूसरों के लिए क्या छोड़ गया। खजान सिंह अपने पीछे आंखों के रूप में ऐसी रोशनी छोड़ गए, जो उनकी मानवीय सोच की कहानी कहती रहेगी।

रिपोर्ट : नीरज उत्तराखंडी

Yogi Varta

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