सीडीएस के पद से सेवानिवृत हुए जनरल अनिल चौहान, रक्षा तैयारियों को दी नई धार
सीडीएस जनरल अनिल चौहान 30 मई 2026 को सेवानिवृत्त हो गए। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय समर स्मारक पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के रूप में उनका लगभग साढ़े तीन वर्षों का कार्यकाल उल्लेखनीय रहा।
इस दौरान उनकी पत्नी अनुपमा चौहान, बेटी और पिता भी उनके साथ मौजूद रहे। श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद उन्होंने अपने पिता के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया, जिसने इस अवसर को और भी भावनात्मक बना दिया।
भारतीय सेना के शीर्ष सैन्य अधिकारी और देश के दूसरे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान 30 मई को अपने पद से सेवानिवृत हो गये।
उनकी उत्कृष्ट सैन्य सेवाओं और रणनीतिक नेतृत्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने उनका कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक बढ़ाने का निर्णय लिया था। यह फैसला न केवल उनकी क्षमता और अनुभव का प्रमाण है, बल्कि देश की सुरक्षा रणनीति में उनकी अहम भूमिका को भी दर्शाता है।

सीडीएस जनरल अनिल चौहान उन सैन्य अधिकारियों में गिने जाते हैं जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी शांत, रणनीतिक और प्रभावी नेतृत्व का परिचय दिया।
जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत और चीन सीमा तक, उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। पिछले साल “ऑपरेशन सिंदूर” में भारत की सैन्य रणनीति और आधुनिकीकरण में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने हाल के वर्षों में देश की सैन्य रणनीति और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेष रूप से “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान उनकी रणनीतिक सोच, सैन्य समन्वय और निर्णय क्षमता चर्चा का केंद्र बनी रही।
इस अभियान ने एक बार फिर यह साबित किया कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ने भर का विषय नहीं रह गया है, बल्कि इसमें तकनीक, खुफिया तंत्र, तीनों सेनाओं के तालमेल और तेज निर्णय क्षमता की बड़ी भूमिका होती है।
जनरल चौहान की रणनीतिक सोच
सीडीएस के रूप में जनरल अनिल चौहान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी तीनों सेनाओं — थलसेना, नौसेना और वायुसेना — के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना था।
“ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान उनकी यही क्षमता सबसे अधिक सामने आई। जनरल चौहान लंबे समय से इस बात के समर्थक रहे हैं कि भविष्य के युद्ध “जॉइंट ऑपरेशंस” यानी संयुक्त सैन्य अभियानों के माध्यम से ही प्रभावी ढंग से लड़े जा सकते हैं।

उन्होंने अभियान के दौरान सैन्य संसाधनों के बेहतर उपयोग, सूचना साझा करने की प्रक्रिया और तेज रणनीतिक प्रतिक्रिया पर विशेष जोर दिया।
रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान रियल टाइम इंटेलिजेंस, ड्रोन निगरानी, सैटेलाइट इनपुट और ग्राउंड ऑपरेशंस के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करना बड़ी चुनौती थी, जिसे सफलतापूर्वक संभाला गया।
आतंकवाद विरोधी अभियानों का अनुभव आया काम
जनरल चौहान को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में आतंकवाद और उग्रवाद विरोधी अभियानों का लंबा अनुभव है। उन्होंने बारामूला सेक्टर से लेकर पूर्वी कमान तक कई संवेदनशील क्षेत्रों में नेतृत्व किया है। यही अनुभव “ऑपरेशन सिंदूर” में उनकी रणनीतिक भूमिका की सबसे बड़ी ताकत बना।
सैन्य सूत्रों के अनुसार, उन्होंने अभियान के दौरान जमीनी वास्तविकताओं और आधुनिक तकनीकी रणनीति के बीच संतुलन बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया। उनका मानना रहा है कि किसी भी अभियान की सफलता केवल हथियारों से नहीं, बल्कि सटीक योजना और समय पर निर्णय लेने से तय होती है।
आधुनिक युद्ध और थिएटर कमांड की सोच
जनरल अनिल चौहान लंबे समय से भारतीय सेना में “थिएटर कमांड” और संयुक्त सैन्य ढांचे को मजबूत करने के पक्षधर रहे हैं। “ऑपरेशन सिंदूर” को भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया, जहां विभिन्न सैन्य इकाइयों के बीच समन्वय को प्राथमिकता दी गई।
उन्होंने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि आने वाले समय में युद्ध पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे। साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष तकनीक, ड्रोन युद्ध और सूचना युद्ध जैसी चुनौतियां सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। यही कारण है कि उनकी कार्यशैली आधुनिक और तकनीक आधारित सैन्य सोच को दर्शाती है।

आतंकवाद विरोधी अभियानों के विशेषज्ञ
जनरल चौहान को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में आतंकवाद और उग्रवाद विरोधी अभियानों का गहरा अनुभव है। उन्होंने बारामूला सेक्टर में एक इन्फैंट्री डिवीजन का नेतृत्व किया, जहां परिस्थितियां हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती हैं।
कश्मीर घाटी और पूर्वोत्तर के संवेदनशील इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान उन्होंने रणनीतिक सूझबूझ और जमीनी अनुभव का परिचय दिया। यही कारण है कि उन्हें भारतीय सेना के सबसे अनुभवी और व्यावहारिक रणनीतिकारों में गिना जाता है।
उन्होंने महानिदेशक सैन्य अभियान (डीजीएमओ) जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी कार्य किया। इस दौरान कई बड़े सैन्य अभियानों और सीमा संबंधी रणनीतियों में उनकी अहम भूमिका रही।
चीन सीमा और पूर्वी कमान में अहम भूमिका
सितंबर 2019 में जनरल अनिल चौहान को भारतीय सेना की पूर्वी कमान का जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ नियुक्त किया गया। यह जिम्मेदारी ऐसे समय में मिली जब भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव लगातार बढ़ रहा था।
पूर्वी कमान देश की सबसे रणनीतिक सैन्य कमानों में से एक मानी जाती है। यह कमान अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा से जुड़ी है। जनरल चौहान ने बेहद नाजुक परिस्थितियों में पूर्वी सीमाओं की सुरक्षा का नेतृत्व किया।
उनकी निगरानी में उत्तरी सीमाओं पर आधुनिक सैन्य ढांचे को मजबूत करने और नवगठित 17 कोर में “इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप” की अवधारणा को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम शुरू हुआ। इसे भविष्य की युद्ध रणनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

बालाकोट एयर स्ट्राइक और रणनीतिक नेतृत्व
जनरल चौहान ने पाकिस्तान के खिलाफ भारत की निर्णायक सैन्य रणनीतियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। माना जाता है कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान रणनीतिक समन्वय में उनका योगदान महत्वपूर्ण था।
उनकी सैन्य रणनीति का मूल सिद्धांत हमेशा स्पष्ट रहा — “आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक, रणनीति और समन्वय से जीते जाते हैं।”
देश के दूसरे सीडीएस
देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत के निधन के बाद 30 सितंबर 2022 को जनरल अनिल चौहान ने देश के दूसरे सीडीएस के रूप में पदभार संभाला। सीडीएस का पद भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त सैन्य रणनीति तैयार करने के लिए बनाया गया है।
जनरल अनिल चौहान इस जिम्मेदारी को मजबूती से निभाया। उन्होंने सैन्य आधुनिकीकरण, थिएटर कमांड और संयुक्त सैन्य संरचना को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मजबूत स्तंभ
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से संबंध रखने वाले जनरल अनिल चौहान आज देश की सुरक्षा रणनीति के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हैं। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले जनरल चौहान ने चार दशक से अधिक लंबे सैन्य जीवन में कई चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं।
18 मई 1961 को दिल्ली में जन्मे जनरल अनिल चौहान का पैतृक गांव उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के खिर्सू ब्लॉक का रामपुर कांडा गवाणा गांव है। उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला और भारतीय सैन्य अकादमी से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। सैन्य शिक्षा के दौरान ही उनके नेतृत्व कौशल और रणनीतिक सोच की झलक दिखाई देने लगी थी।
साल 1981 में उन्हें भारतीय सेना की प्रतिष्ठित 11 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। गोरखा रेजिमेंट अपनी वीरता, अनुशासन और अदम्य साहस के लिए जानी जाती है। यहीं से शुरू हुआ उनका चार दशक से अधिक लंबा सैन्य सफर।
सम्मान और उपलब्धियां
अपनी विशिष्ट और असाधारण सेवाओं के लिए जनरल अनिल चौहान को कई प्रतिष्ठित सैन्य सम्मानों से नवाजा जा चुका है। इनमें शामिल हैं पीवीएसएम, यूवीएसएम, एवीएसएम, एसएम और वीएसएम। ये सम्मान उनके साहस, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं।

