दुबई के ‘बजरंगी भाईजान’ गिरीश पंत
उत्तराखंड के संदर्भ में अक्सर कहा जाता है कि ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम नहीं आती।’ पहाड़ों से निकलने वाली नदियां मैदानों को सींचती हैं और पहाड़ों के युवा रोज़गार व बेहतर भविष्य की तलाश में देश-विदेश की ओर निकल पड़ते हैं। यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि उत्तराखंड सहित कई पहाड़ी राज्यों की सामाजिक त्रासदी, पलायन, का यथार्थ चित्र है।
लेकिन यही पलायन जब किसी संवेदनशील और संकल्पशील व्यक्ति के भीतर सामाजिक चेतना जगा देता है, तब वह अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और देश के लिए जीने का मार्ग चुनता है। ऐसे ही एक जीवट व्यक्तित्व हैं — गिरीश पंत, जिन्हें आज दुबई ही नहीं, बल्कि भारत और प्रवासी भारतीय समाज में ‘दुबई के बजरंगी भाईजान’ के नाम से जाना जाता है।
गिरीश पंत उत्तराखंड से निकलकर दिल्ली और फिर दुबई पहुंचे। उन्होंने पहले अपने पेशेवर जीवन में स्थिरता हासिल की और फिर उसी स्थिरता को दूसरों का सहारा बना दिया। आज वे उन भारतीयों के लिए आशा का नाम हैं, जो किसी न किसी कारण से विदेशों में फंस जाते हैं। अब तक वे दुबई सहित विभिन्न देशों में फंसे एक हज़ार से अधिक भारतीय नागरिकों को सुरक्षित स्वदेश लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं।

उनकी इस निस्वार्थ सेवा को भारत सरकार ने भी मान्यता दी। वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में आयोजित प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा उन्हें प्रवासी भारतीय सम्मान से अलंकृत किया गया। यह सम्मान न केवल उनके कार्यों की पुष्टि था, बल्कि प्रवासी समाज की पीड़ा को समझने वाले एक कर्मयोगी का सार्वजनिक स्वीकार भी।
मूल रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद स्थित बेरीनाग के निवासी गिरीश पंत की शिक्षा दिल्ली में हुई। उन्होंने एमबीए (फाइनेंस) की डिग्री प्राप्त की और वर्ष 2008 में दुबई में एक प्रतिष्ठित कंपनी के साथ कार्य प्रारंभ किया। बीते एक दशक से अधिक समय से वे दुबई में रह रहे हैं। आमतौर पर कॉरपोरेट पृष्ठभूमि से आए लोगों का समाजसेवा की ओर मुड़ना लोगों को आश्चर्य में डालता है, लेकिन गिरीश पंत के जीवन में यह बदलाव एक गहरे मानवीय अनुभव से जुड़ा है।
वर्ष 2013 की उत्तराखंड आपदा ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। अपने पहाड़ को तबाही से जूझते देख वे निष्क्रिय नहीं रह सके। उन्होंने दुबई में रहते हुए राहत सामग्री और पर्याप्त आर्थिक सहायता एकत्र की और स्वयं राहत लेकर उत्तराखंड पहुंचे। यही वह मोड़ था, जब लोगों ने उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचाना।
इसके बाद विदेशों में फंसे भारतीयों की समस्याएं उनके पास आने लगीं। उन्होंने दुबई में फंसे उत्तराखंड निवासी निर्मल रावत को रेस्क्यू कराया, गुजरात के 26 नागरिकों को स्वदेश लौटाने में मदद की और अनगिनत मामलों में कानूनी, प्रशासनिक और मानवीय सहयोग प्रदान किया। उनके इन्हीं प्रयासों के लिए हैदराबाद माइग्रेशन रिसोर्स सेंटर ने वर्ष 2015 में उन्हें प्रवासी मित्रता अवॉर्ड से सम्मानित किया।

गिरीश पंत बताते हैं कि इस सेवा-यात्रा की जड़ें उनके एक निजी अनुभव में हैं। वर्षों पहले उनके एक रिश्तेदार की दुबई में मृत्यु हो गई थी और पार्थिव शरीर को भारत लाने में उन्हें भारी कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ा। उसी दौरान उन्होंने दुबई के कानूनों और प्रक्रियाओं को गहराई से समझा। बाद में यही ज्ञान विदेश में फंसे भारतीयों के लिए जीवनरेखा बन गया।
आज वे उन प्रवासी भारतीयों की मदद करते हैं, जो नौकरी, दस्तावेज़, क़ानूनी मामलों या आर्थिक संकट के कारण स्वदेश नहीं लौट पा रहे होते। दुबई के भारतीय समुदाय में उनकी लोकप्रियता इतनी व्यापक है कि लगभग हर भारतीय के पास उनका संपर्क होता है। इतना ही नहीं, वे कई बांग्लादेशी और नेपाली नागरिकों की भी मानवीय आधार पर सहायता कर चुके हैं।
गिरीश पंत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कभी भी अपने कार्यों का प्रचार नहीं करते। बिना किसी पद, सत्ता या दिखावे के वे मानवता की सेवा में लगे रहते हैं। उनके जीवन पर वही पंक्ति सटीक बैठती है — ‘कुछ लोग पद से नहीं, अपने कर्मों से बड़े बनते हैं।’
वर्तमान में गिरीश पंत सत्य साईं ऑर्फ़न ट्रस्ट, तिरुवनंतपुरम के यूएई अध्यक्ष हैं। वे द हिंदी काउंसिल के सक्रिय सदस्य हैं, इंडियन पीपुल्स फ़ोरम, यूएई के अध्यक्ष हैं और भारतीय दूतावास से जुड़ी विभिन्न समितियों में भी योगदान दे रहे हैं।
गिरीश पंत जैसे लोग केवल उत्तराखंड या प्रवासी समाज की ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की नैतिक पूंजी हैं। वे यह सिद्ध करते हैं कि सच्ची देशभक्ति शब्दों में नहीं, बल्कि संकट में खड़े होने की हिम्मत में होती है।

