हिमालय और गंगा के संरक्षक : सुंदरलाल बहुगुणा
यदि हम चाहते हैं कि हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहे, तो केवल सुंदरलाल बहुगुणा के जीवन और उनके संदेशों को पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। हमें उन्हें अपने जीवन में अपनाना भी होगा। उत्तराखंड की पवित्र भूमि से जुड़ा यह महान पर्यावरणविद् और समाज सुधारक अपने जीवन का समर्पण प्रकृति संरक्षण को दे चुके हैं।
चिपको आंदोलन और महिलाओं की भूमिका
बहुगुणा जी चिपको आंदोलन के प्रमुख प्रेरणास्रोत थे। इस आंदोलन में ग्रामीण, विशेषकर महिलाएं, पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाती थीं। उनका प्रसिद्ध संदेश था ‘पेड़ बचाओ, जीवन बचाओ।’
वे यह मानते थे कि सच्चा विकास वही है जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखकर हो। टिहरी बांध परियोजना के विरोध में उन्होंने अहिंसात्मक आंदोलन चलाया और पूरे देश में ग्रामीणों में जागरूकता फैलाई।
पदयात्राएं और जनजागरण
सुंदरलाल बहुगुणा ने गांव-गांव जाकर लोगों को जल, जंगल और जमीन के महत्व के बारे में समझाया। उनकी लंबी पदयात्राओं ने पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा दी। वे सादगी और त्याग के प्रतीक थे, और उत्तराखंड में पर्यावरण चेतना जगाने में उनका योगदान अमूल्य है।
बहुगुणा जी का मानना था ‘हिमालय सुरक्षित रहेगा तो देश सुरक्षित रहेगा।’ उनके प्रयासों और संघर्षों ने पर्यावरण आंदोलन को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने युवाओं को प्रकृति की रक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया और सिखाया कि हमारी मातृभूमि केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी मां के समान है।
युवा और भविष्य के लिए प्रेरणा
आज जब जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, उनके विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। हर युवा को कम से कम एक पेड़ लगाने और उसकी देखभाल करने का संकल्प लेना चाहिए। प्लास्टिक का कम उपयोग, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग जैसे छोटे कदम भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।
बहुगुणा जी की शिक्षा हमें संयमित जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देती है। यदि हम उनके सिद्धांतों को अपनाएं, तो न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरा विश्व हरा-भरा और सुरक्षित बन सकता है।
सुंदरलाल बहुगुणा का जीवन त्याग, समर्पण और देशभक्ति का प्रतीक है। उनका योगदान यह दिखाता है कि प्रकृति और समाज के लिए समर्पित जीवन ही सच्ची महानता है। उनका संदेश आज भी हर पर्यावरण प्रेमी, युवा और नागरिक के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

