देवभूमि में छाया होली का रंग, गांव-कस्बों में उमड़ा उत्साह

देवभूमि में छाया होली का रंग, गांव-कस्बों में उमड़ा उत्साह

रंगों का त्योहार होली सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इसे होली, होलिका या होलाका के नाम से बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली होली उत्तर भारत में लगभग एक सप्ताह तक, जबकि मणिपुर में छह दिनों तक उत्साहपूर्वक मनाई जाती है।

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में पौष माह से ही बैठकी होली के साथ इस पर्व की शुरुआत हो जाती है। बसंत पंचमी तक आध्यात्मिक होली गाई जाती है, पंचमी से महाशिवरात्रि तक अर्ध-श्रृंगारिक और उसके बाद श्रृंगार रस से ओतप्रोत होली गीतों का दौर चलता है।

बसंत पंचमी के आते ही पर्वतीय क्षेत्रों में होल्यारों का उत्साह देखने योग्य होता है। महाशिवरात्रि से खड़ी होली का आरंभ हो जाता है। रंग एकादशी को चीर बांधी जाती है और इसके बाद होली का उत्सव पूरे शबाब पर पहुंच जाता है। महिला और पुरुष समूह कदमताल करते हुए गीतों में झूमते नजर आते हैं।

बैठकी होली की अनूठी परंपरा

सांझ ढलते ही होल्यारों की महफिलें सज जाती हैं। होली की बैठकों में हर उम्र के लोग शामिल होते हैं। ढोल, मंजीरा, हारमोनियम, हुड़का, चिमटा, ढपली और थाली की मधुर ध्वनि वातावरण को सुरमयी बना देती है। पूरी रात राग-आधारित होली गायन चलता है और भोर का पता ही नहीं चलता।

बैठकी होली में सांयकालीन राग से शुरुआत होती है। सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है, इसके बाद देवी-देवताओं, प्रकृति, प्रेम और श्रृंगार के गीत गाए जाते हैं। सुबह भैरवी राग के साथ बैठक का समापन होता है।

होली गायन में भक्ति, बैराग्य, विरह, कृष्ण-गोपियों की हंसी-ठिठोली, प्रेमी-प्रेमिका संवाद और देवर-भाभी की छेड़छाड़ जैसे विविध रस समाहित होते हैं। राग-रागिनियों में बंधी ये बंदिशें शास्त्रीयता की मिसाल हैं। कुमाऊं की होली ब्रज भाषा में गाई जाती है, जो इसकी विशिष्ट पहचान है।

महिलाओं और पुरुषों की अलग परंपरा

कुमाऊं अंचल में दिन में महिलाओं की टोली घर-घर जाकर बैठकर होली गाती है, जबकि रात में पुरुषों की खड़ी होली होती है। पुरुष गोल घेरे में ढोलक-हुड़का बजाते हुए नृत्य और ठुमकों के साथ गीत गाते हैं।

होल्यारों का स्वागत प्रत्येक घर में गुड़, मिठाई, गुजिया, आलू के गुटके और भांग की चटनी से किया जाता है। महिलाएं पारंपरिक साड़ी और पुरुष सफेद कुर्ता-पायजामा पहनकर होली गायन में भाग लेते हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में चीर प्रथा का विशेष महत्व है। प्रत्येक घर से नए कपड़े का एक टुकड़ा लेकर ‘पौंय’ पेड़ की डाली पर बांधा जाता है और उसे आंगन में स्थापित किया जाता है। पूर्णिमा को चीर दहन होता है और अगले दिन छरड़ी (धुलेड़ी) मनाई जाती है। टीका कार्यक्रम के साथ होली का समापन होता है।

जहां नहीं मनती होली

गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि ब्लॉक की तल्ला नागपुर पट्टी के क्वेली, चौदला और कुटछड़ गांवों में पौराणिक मान्यताओं के कारण पिछले लगभग पंद्रह पीढ़ियों से होली नहीं मनाई जाती। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व परंपरा तोड़ने पर गांव में हैजा और अन्य बीमारियां फैल गई थीं, जिसके बाद से होली न मनाने की परंपरा जारी है।

किंवदंती के अनुसार लगभग चार सौ वर्ष पूर्व जम्मू-कश्मीर से आए कुछ परिवार अपनी कुलदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी की मूर्ति साथ लाए थे। मान्यता है कि देवी को होली का हुड़दंग पसंद नहीं था, इसलिए गांवों में आज भी यह पर्व नहीं मनाया जाता।

कुमाऊं की होली की राष्ट्रीय पहचान

हल्द्वानी, भवाली, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़, लोहाघाट और अल्मोड़ा सहित कुमाऊं के कई क्षेत्रों में रंग एकादशी से दिन-रात होली गायन की धूम रहती है। ब्रज के बाद कुमाऊं की होली को राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इसका इतिहास लगभग दो सौ वर्ष पुराना माना जाता है और चंद राजाओं के समय से इसका उल्लेख मिलता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदेश

होली प्रेम, सद्भाव और मानव कल्याण का पर्व है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य और लोककथाओं में इसके संस्कार और मान्यताएं झलकती हैं। प्रह्लाद, कामदेव, धुंधी और पूतना जैसी पौराणिक कथाएं अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देती हैं।

देवभूमि उत्तराखंड में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, शास्त्रीय संगीत और सामाजिक एकता का अनुपम संगम है, जो पीढ़ियों से लोगों के हृदय में बसता आया है।

– सी.एम. पपनैं, नैनीताल

Yogi Varta

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