गढ़वाल-कुमाऊँ में सुरों संग सजी होली की संध्या

गढ़वाल-कुमाऊँ में सुरों संग सजी होली की संध्या

गढ़वाल और कुमाऊं की वादियों में होली का उल्लास अपने चरम पर है। वास्तविक होली से एक दिन पहले ही पहाड़ के गाँव उत्सव के रंग में पूरी तरह रंग चुके हैं। बर्फ से ढकी चोटियों के बीच बसे छोटे-छोटे गाँवों में शाम ढलते ही चौपालों और मंदिर प्रांगणों में लोगों की चहल-पहल बढ़ने लगी है। जैसे ही सूरज पहाड़ों के पीछे छिपा, ढोलक और मंजीरों की थाप के साथ बैठक होली की मधुर स्वर लहरियां वातावरण में गूंजने लगी हैं।

गाँव के बुजुर्ग, जो वर्षों से राग-रागिनियों की परंपरा को सहेजे हुए हैं, पूरे मनोयोग से होली गीत गा रहे हैं। उनके सुरों में गहराई है, अनुभव है और संस्कृति की सुगंध है। युवा पीढ़ी भी पूरे उत्साह के साथ उनका साथ दे रही है। कोई हारमोनियम संभाल रहा है तो कोई ढोलक की थाप पर लय बाँध रहा है। लोकगीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों की छटा है, तो कहीं पहाड़ की वीरता और प्रकृति की सुंदरता का वर्णन किया जा रहा है।

कुमाऊँ क्षेत्र में खड़ी होली की टोलियाँ गाँव-गाँव घूम रही हैं। सफेद कुर्ता-पायजामा और सिर पर रंगीन टोपी पहने युवक घर-घर जाकर गीतों के माध्यम से शुभकामनाएँ दे रहे हैं। लोग अपने आँगन में उनका स्वागत करते, गुजिया और मीठे पकवान परोसते और साथ में सुर मिलाते दिख रहे हैं। गढ़वाल में भी सामूहिक होली गायन का वही उत्साह है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना के बाद होली की महफिल सजती और देर रात तक सुरों का सिलसिला चल रहा है।

हर घर में पकवानों की खुशबू बिखरी हुई है। रसोई में गुजिया, मालपुए और अन्य पारंपरिक व्यंजन बन रहे हैं। महिलाएँ पारंपरिक घाघरा-पिछौड़ा पहनकर समूह में होली गीत गा रही हैं। उनकी तालियों की गूंज और मधुर हँसी पूरे वातावरण को और भी जीवंत बना रही हैं। बच्चे रंगों की तैयारी में जुटे हैं कोई पिचकारी सँभाल रहा है, तो कोई गुलाल की थाल सजा रहा है।

दूर-दराज के शहरों से लौटे लोग भी इस सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बनने आए हैं। वर्षों बाद गाँव की होली में शामिल होकर उनके चेहरे पर एक अलग ही संतोष है। चौपाल में चाय के कुल्हड़ के साथ बैठकी होली का दौर चलता रहा। बीच-बीच में हँसी-मजाक और पुरानी यादों का सिलसिला भी छिड़ जाता है।

रात गहराती गई, पर उत्साह कम नहीं हुआ। सुर और लय जैसे ठंडी हवा में घुलकर पूरे पहाड़ को संगीतमय बना रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पूरा गढ़वाल और कुमाऊँ सुरों और परंपराओं के रंग में डूब गया हो।

कल रंगों की होली है, पर आज की यह सांस्कृतिक संध्या ही अपने आप में एक अनमोल उत्सव बन चुकी है। जहाँ पीढ़ियाँ एक साथ बैठकर परंपरा को जी रही हैं, सहेज रही हैं और आने वाले कल के लिए संजो रही हैं।

Yogi Varta

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