सरहद पर पति, न्याय की राह पर पत्नी

सरहद पर पति, न्याय की राह पर पत्नी

उत्तराखंड के पहाड़ों से निकली कुछ थकी हुई लेकिन अडिग कदमों की आहट इन दिनों दिल्ली की ओर बढ़ रही है। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं है। यह यात्रा है टूटे हुए भरोसे, खोई हुई जमा-पूंजी और न्याय की तलाश की।

इस यात्रा की एक सशक्त लेकिन भावुक तस्वीर हैं सरस्वती देवी। उनके पति भारतीय सेना में तैनात हैं और देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन घर से दूर उनकी पत्नी इन दिनों एक अलग मोर्चे पर लड़ाई लड़ रही हैं, अपने अधिकारों और न्याय के लिए।

एक भरोसा, जो टूट गया

पहाड़ के छोटे-छोटे गांवों में रहने वाले लोग अक्सर अपनी मेहनत की कमाई बड़ी सावधानी से बचाते हैं। थोड़ी-थोड़ी रकम जोड़कर वे भविष्य के सपने देखते हैं बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत, या बुढ़ापे की सुरक्षा।

सरस्वती देवी और उनके जैसी कई महिलाओं ने भी यही किया। उन्होंने अपनी वर्षों की बचत एक वित्तीय संस्था में जमा कर दी। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि उनका पैसा सुरक्षित रहेगा और समय के साथ बढ़ेगा।

लेकिन अचानक एक दिन खबर आई कि LUCC (Loni Urban Multi State Credit & Thrift Co-operative Society) से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है। निवेशकों के करोड़ों रुपये फंस गए और कई संचालक फरार हो गए।

यह खबर पहाड़ के उन घरों तक पहुंची, जहां लोगों ने अपनी जिंदगी की कमाई इस संस्था में लगा दी थी। उस दिन कई परिवारों के सपने एक साथ टूट गए।

महीनों तक चला इंतज़ार

जब पैसे वापस नहीं मिले, तो लोगों ने न्याय की उम्मीद में आवाज़ उठानी शुरू की। सरस्वती देवी और उनके साथ की महिलाओं ने धरने दिए, प्रदर्शन किए और प्रशासन से गुहार लगाई।

महिलाओं का कहना है कि वे 200 से 300 दिनों से भी अधिक समय तक धरने पर बैठी रहीं। उन्होंने अधिकारियों से मिलने की कोशिश की, ज्ञापन दिए और बार-बार अपनी पीड़ा बताई।

उनकी सबसे बड़ी उम्मीद थी कि राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उनसे मिलेंगे और उनकी समस्या सुनेंगे। लेकिन बार-बार प्रयास करने के बावजूद उन्हें मिलने का अवसर नहीं मिला। यह उपेक्षा उनके लिए किसी और दर्द से कम नहीं थी।

एक कठिन फैसला

लंबे इंतज़ार और निराशा के बाद इन महिलाओं ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि अगर उनकी आवाज़ राज्य स्तर पर नहीं सुनी जा रही, तो वे इसे देश की राजधानी तक लेकर जाएंगी। और इसी निर्णय के साथ शुरू हुआ श्रीनगर (गढ़वाल) से दिल्ली तक का पैदल मार्च।

करीब एक दर्जन महिलाएं कुछ मध्यम आयु की, कुछ बुजुर्ग हर दिन कई किलोमीटर पैदल चल रही हैं। उनके कंधों पर बैग हैं, हाथों में बैनर हैं और दिल में न्याय की उम्मीद।

रास्ते की थकान और अनजानों का सहारा

यह सफर आसान नहीं है। पहाड़ों से निकलकर मैदानों की लंबी सड़कों पर चलना, तेज धूप और थकान से जूझना हर दिन एक नई चुनौती है।

कई बार उनके पैर सूज जाते हैं, शरीर जवाब देने लगता है। लेकिन फिर भी वे रुकती नहीं हैं। रास्ते में कुछ अजनबी लोग उनके अपने बन जाते हैं। कोई उन्हें पानी दे देता है, कोई खाने का पैकेट पकड़ा देता है। कई लोग उनकी कहानी सुनकर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं — “आप हिम्मत मत हारिए।”

ये छोटे-छोटे सहारे उनके लिए नई ऊर्जा बन जाते हैं।

राजधानी से उम्मीद

अब यह महिलाओं का समूह धीरे-धीरे दिल्ली के करीब पहुंच रहा है। उनकी उम्मीद है कि राजधानी पहुंचकर वे देश की राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू तक अपनी बात पहुंचा सकेंगी।

उनका विश्वास है कि अगर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक उनकी आवाज़ पहुंचेगी, तो शायद उनके साथ हुए अन्याय की सुनवाई होगी।

पहाड़ की बेटियों का साहस

यह आंदोलन केवल पैसों की वापसी की लड़ाई नहीं है। यह उस भरोसे की लड़ाई है, जो आम नागरिक व्यवस्था पर करता है।

पहाड़ की इन महिलाओं ने दिखाया है कि जब परिस्थितियां कठिन हो जाती हैं, तब भी साहस और उम्मीद का रास्ता छोड़ा नहीं जाता।

एक ओर सरहद पर तैनात सैनिक देश की रक्षा कर रहे हैं और दूसरी ओर उनकी पत्नी और कई अन्य महिलाएं अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर रही हैं।

यह कहानी केवल एक आंदोलन की नहीं है। यह कहानी है उस अदम्य नारी शक्ति की, जो पहाड़ों से निकलकर पूरे देश को यह संदेश दे रही है कि न्याय के लिए उठे कदम कभी व्यर्थ नहीं जाते।

Yogi Varta

Yogi Varta

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