अवैध खनन और भारी निर्माण से संकट में हिमालय की नदियाँ

अवैध खनन और भारी निर्माण से संकट में हिमालय की नदियाँ

लोकेंद्र सिंह बिष्ट, उत्तरकाशी

हिमालय की गोद में बहने वाली सदानीरी नदियाँ माँ गंगा और माँ यमुना आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही हैं। उत्तरकाशी जिले में इन आस्था की नदियों में हो रहे अवैध और अवैज्ञानिक खनन ने न केवल नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि पूरे पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र को भी अस्थिर कर दिया है।

गंगा और यमुना नदी में 10–20 फीट तक ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर अत्यधिक गहराई तक खनन किया जा रहा है। भारी-भरकम पोकलैंड, जेसीबी मशीनें और दिन-रात गरजते क्रशर नदियों की छाती को छलनी कर रहे हैं। इसके चलते नदियों के प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ कर उन्हें कभी एक किनारे तो कभी दूसरे किनारे धकेला जा रहा है, जिससे वे कृत्रिम नहरों में तब्दील होती जा रही हैं।

आपदाओं का बढ़ता सिलसिला

हाल ही में गंगोत्री घाटी के धराली क्षेत्र में आई आपदा ने एक बार फिर पहाड़ों की संवेदनशीलता को उजागर किया है। धरासू से लेकर धराली तक गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग के लगभग 100 किलोमीटर क्षेत्र में जगह-जगह पहाड़ों के भरभराकर गिरने, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाएँ सामने आई हैं। समूचा उत्तरकाशी जिला अभी तक इन आपदाओं के प्रभाव से उबर नहीं पाया है।

वहीं यमुना घाटी में यमुनोत्री धाम के समीप श्यानाचट्टी के पास कुपड़ा खड्ड में बादल फटने और भूस्खलन से आए भारी मलबे ने यमुना नदी के प्रवाह को रोक दिया था। इससे बनी झील में दर्जनों होटल, मकान, दुकानें, यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग और मोटर पुल समा गए। इस आपदा के कारण यमुनोत्री की ओर जाने वाले कई दर्जन गाँवों का संपर्क देश-दुनिया से कट गया था।

मानवीय हस्तक्षेप भी जिम्मेदार

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि इन आपदाओं के पीछे केवल प्राकृतिक कारण ही नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियाँ भी बड़ी वजह हैं। यमुना नदी में नौगांव से लेकर यमुनोत्री की ओर खराड़ी तक और गंगा नदी में उत्तरकाशी से धरासू तक बड़े पैमाने पर अवैध खनन और क्रशर संचालन जारी है। नदियों से क्रशरों तक सामग्री पहुँचाने के लिए भारी मशीनें लगातार नदी में सक्रिय रहती हैं।

देवदार के जंगलों पर भी संकट

गंगा घाटी में गंगा नदी के साथ-साथ फैले देवदार के जंगल हिमालय की सुंदरता ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक संतुलन की रीढ़ हैं। सड़क निर्माण और अन्य परियोजनाओं के नाम पर इन सदियों पुराने जंगलों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र में एक पौधे को पेड़ बनने में हजारों वर्ष लगते हैं, ऐसे में इन वनों का विनाश अपूरणीय क्षति है।

कड़े फैसलों की जरूरत

हाल ही में धराली आपदा के बाद सरकार ने नदियों के किनारों पर भारी निर्माण पर रोक लगाने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन को सौंपी है। अब आवश्यकता है कि इसी तरह आस्था की इन नदियों के किनारे स्थापित भारी-भरकम क्रशरों पर प्रतिबंध लगाया जाए और गंगा व यमुना नदियों में सभी प्रकार के खनन पर पूर्ण रोक लगाई जाए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालय, गंगा और यमुना का यह संकट आने वाले समय में और भी भयावह रूप ले सकता है।

Yogi Varta

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