कीवी की खेती से बदली राजेंद्र कोरंगा की किस्मत, लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के शामा क्षेत्र का एक छोटा-सा गांव, जहां कभी सीमित संसाधन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और पलायन की पीड़ा आम बात थी। इसी गांव से निकली एक कहानी आज पूरे पहाड़ के युवाओं के लिए उम्मीद की किरण बन चुकी है।
यह कहानी है राजेंद्र कोरंगा की, जिन्होंने यह साबित कर दिखाया कि अगर सोच सकारात्मक हो और इरादे मजबूत हों, तो पहाड़ों में रहकर भी आत्मनिर्भर और सफल जीवन जिया जा सकता है।
पारंपरिक खेती से नई सोच तक
राजेंद्र कोरंगा का परिवार वर्षों से पारंपरिक खेती करता आ रहा था। सीमित पैदावार, मौसम की मार और बाजार की कमी के कारण खेती से पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी। गांव के कई युवा रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके थे। ऐसे माहौल में राजेंद्र जी के सामने भी वही रास्ता था, या तो शहर जाएं या फिर गांव में कुछ अलग करें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
कीवी की खेती: एक साहसिक निर्णय
राजेंद्र ने कृषि से जुड़े प्रशिक्षणों, वैज्ञानिकों की सलाह और नई जानकारियों के माध्यम से यह समझा कि पहाड़ की जलवायु कुछ विशेष फसलों के लिए बेहद अनुकूल है। इसी खोज ने उन्हें कीवी की खेती की ओर प्रेरित किया। जो उस समय क्षेत्र में एक नया और जोखिम भरा प्रयोग माना जा रहा था।
शुरुआत आसान नहीं थी। पौधों की व्यवस्था, तकनीकी जानकारी, धैर्य और शुरुआती, लागत सब कुछ एक चुनौती था। कई लोगों ने संदेह भी जताया, लेकिन राजेंद्र जी अपने लक्ष्य पर डटे रहे।
मेहनत का फल रंग लाया
कुछ वर्षों की निरंतर मेहनत और सही तकनीक के उपयोग से उनकी कीवी की खेती सफल होने लगी। आज उनकी बगान से उच्च गुणवत्ता की कीवी का उत्पादन हो रहा है, जिसकी मांग न सिर्फ स्थानीय बाजारों में है बल्कि बाहरी राज्यों तक भी पहुंच रही है।
इस खेती से उन्हें स्थायी और अच्छी आय मिलने लगी, उनका परिवार आर्थिक रूप से सशक्त हुआ, गांव के अन्य लोगों को रोज़गार मिलने लगा, पहाड़ी उत्पादों को नई पहचान मिली।
गांव के लिए बदलाव की शुरुआत
राजेंद्र कोरंगा की सफलता ने गांव में एक सकारात्मक माहौल पैदा किया। अब दूसरे किसान भी नकदी फसलों, बागवानी और आधुनिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। जो युवा कभी शहर जाने का सपना देखते थे, वे अब गांव में रहकर कुछ करने की संभावनाएं तलाशने लगे हैं।
राजेंद्र का युवाओं को स्पष्ट और सशक्त संदेश है, ‘नौकरी के पीछे भागने से बेहतर है कि अपने गांव, अपनी जमीन और अपने संसाधनों को पहचानें। स्वरोज़गार अपनाएं और रिवर्स माइग्रेशन की मिसाल बनें। गांव छोड़ने की नहीं, गांव को संवारने की ज़रूरत है।’
उनका मानना है कि अगर युवा आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान को साथ लेकर चलें, तो गांव ही विकास, सम्मान और खुशहाली का केंद्र बन सकता है।
राजेंद्र कोरंगा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के पहाड़ों की असली ताकत को दर्शाती है। यह कहानी बताती है कि पहाड़ों को छोड़ने की नहीं, बल्कि उन्हें नई दिशा देने की ज़रूरत है।
ऐसे जाबाज़ लोग ही आत्मनिर्भर भारत और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की नींव मजबूत कर रहे हैं।

