एनएच-07 और धारी देवी क्षेत्र: विकास बनाम पर्यावरण

एनएच-07 और धारी देवी क्षेत्र: विकास बनाम पर्यावरण

प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट, श्रीनगर गढ़वाल

उत्तराखंड में स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग-07 (NH-07) के धारी देवी क्षेत्र में गंभीर पर्यावरणीय संकट उभर कर सामने आ रहा है। वर्ष 2025 की मानसूनी वर्षा के बाद, यह क्षेत्र अत्यधिक गाद जमाव, जलभराव और तीव्र भू-कटाव से प्रभावित हुआ है, जिससे यातायात व्यवस्था, स्थानीय आबादी तथा धार्मिक पर्यटन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

विशेषज्ञों और क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि यह संकट श्रीनगर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के निर्माण के दौरान बैराज की ऊंचाई मानक से अधिक बढ़ाने के निर्णय का प्रत्यक्ष परिणाम है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2005-06 में इस संबंध में एक जनहित याचिका भी उत्तराखंड उच्च न्यायालय में दायर की गई थी, जिसमें इस प्रकार के संभावित दुष्परिणामों की आशंका जताई गई थी।

नदी तल में 60 मीटर तक गाद जमा, खेतों का स्तर खतरे में

धारी देवी क्षेत्र में अलकनंदा नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में पिछले एक दशक में लगभग 60 मीटर तक गाद (Sediment) का जमाव हो चुका है। पहले जहां धारी गांव के खेतों की ऊंचाई नदी तल से 65 मीटर हुआ करती थी, अब वह घटकर मात्र 5 मीटर रह गई है।

इसी कारण वर्ष 2025 में अलकनंदा के जल स्तर में वृद्धि होने पर, धारी देवी से रुद्रप्रयाग की ओर एनएच-07 का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया। इस दौरान एक यात्री बस के जलधारा में बह जाने की घटना ने प्रशासन और आम नागरिकों को झकझोर कर रख दिया।

भू-कटाव के कारण तीन स्थानों पर सड़क खतरे में

अलकनंदा के दोनों किनारों पर लगातार हो रहे भू-कटाव के चलते शेर-ओ-बगड़ से फराशू तक एनएच-07 के तीन स्थानों पर गंभीर क्षति सामने आई है। इन क्षेत्रों में नदी के घुमाव और पक्की चट्टानों की अनुपस्थिति के कारण कटाव और भी तीव्र हो गया है।

विशेष रूप से फराशू गांव के समीपवर्ती क्षेत्र में कटाव की गति इतनी अधिक है कि भविष्य में राष्ट्रीय राजमार्ग का मार्ग परिवर्तन (Diversion) करना प्रशासन की मजबूरी बन सकता है।

स्थानीय अपील और सुझाव

स्थानीय नागरिकों, विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने शासन-प्रशासन से निम्न सुझाव और मांगें रखी हैं:

  • धारी देवी क्षेत्र में वैज्ञानिक आधार पर सेडिमेंट हटाने (Dredging) की प्रक्रिया शुरू की जाए।
  • भू-कटाव प्रभावित क्षेत्रों में तटीय सुरक्षा कार्य (revetment walls, soil stabilization) शीघ्र शुरू हो।
  • श्रीनगर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय समीक्षा की जाए और उच्च न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
  • प्रभावित गांवों के लिए दीर्घकालीन पुनर्वास योजना तैयार की जाए।
  • एनएच-07 के वैकल्पिक मार्गों की संभाव्यता रिपोर्ट (Feasibility Study) पर कार्य शुरू किया जाए।

धारी देवी जैसे पवित्र और पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में यह संकट केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं, बल्कि विकास और पारिस्थितिकीय संतुलन के बीच टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है। यदि समय रहते ठोस और वैज्ञानिक उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले समय में यह संकट और भी विकराल रूप ले सकता है।

Yogi Varta

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