आपदा में लापता लोगों को एक साल के अंदर मृत घोषित किया जाए

आपदा में लापता लोगों को एक साल के अंदर मृत घोषित किया जाए

जयसिंह रावत, देहरादून

हाल ही में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बादल फटने, त्वरित बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि आपदाएं केवल मृतकों की गिनती तक सीमित नहीं होतीं। इससे कहीं बड़ी चुनौती उन लापता व्यक्तियों की होती है, जो जीवित नहीं होते — परंतु कानूनी रूप से मृत भी नहीं माने जाते।

इस मानसून में भी इन राज्यों से अनेक लोगों के लापता होने की खबरें हैं। अक्सर किसी आपदा में जितनी मौतों की पुष्टि होती है, उससे अधिक संख्या में लोग लापता बताए जाते हैं। ये घटनाएं उस गंभीर कानूनी और मानवीय संकट की ओर ध्यान खींचती हैं, जिसमें लापता व्यक्तियों के परिवार वर्षों तक असमंजस और मानसिक पीड़ा झेलते हैं।

सात वर्षों की प्रतीक्षा: एक अनुपयुक्त प्रावधान?

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, भारत में हर साल बाढ़ और भूस्खलन से औसतन 1,000 से अधिक मौतें होती हैं। लेकिन लापता व्यक्तियों का कोई सुव्यवस्थित आंकड़ा नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, मृतकों की संख्या से 20 से 50 प्रतिशत अधिक लोग लापता रहते हैं, क्योंकि उनके शव बह जाते हैं या मलबे में दबे रह जाते हैं।

भारत में लापता लोगों को कानूनी रूप से मृत घोषित करने का आधार भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 108 है। इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सात वर्षों तक लापता रहता है और उसका कोई पता नहीं चलता, तभी उसे मृत घोषित किया जा सकता है। यह प्रावधान सामान्य परिस्थितियों में तो उपयुक्त हो सकता है, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के मामलों में यह एक बड़ी बाधा बन जाता है।

मृत नहीं माने गए तो मुआवजा नहीं

आपदा राहत नियमों के अनुसार, मुआवजा केवल मृत घोषित किए गए व्यक्तियों के परिजनों को ही मिलता है। ऐसे में लापता व्यक्तियों के परिवारों को सात साल तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस दौरान उन्हें मृत्यु प्रमाण-पत्र नहीं मिलता, संपत्ति के हस्तांतरण में अड़चन आती है, बीमा क्लेम, पेंशन, सरकारी योजनाएं बाधित होती हैं,
विधवा पेंशन, अनुकंपा नियुक्ति और छात्रवृत्ति जैसे लाभ नहीं मिलते, नतीजा गरीब और निम्न वर्गीय परिवार आर्थिक एवं सामाजिक असुरक्षा में धकेल दिए जाते हैं।

कुछ अपवाद: उम्मीद की किरण

हालांकि कुछ मामलों में सरकार ने सात वर्षों की शर्त को दरकिनार करते हुए त्वरित निर्णय लिए हैं, जैसे 2013 केदारनाथ आपदा में हजारों लापता लोगों को एक वर्ष के भीतर मृत घोषित किया गया। 2023 की सिक्किम आपदा में भी राज्य सरकार ने विशेष आदेश द्वारा लापता लोगों को मृत मानकर मुआवजा प्रदान किया। लेकिन ये व्यवस्थाएं केवल विशेष और अस्थायी अपवाद हैं, जो स्थायी समाधान नहीं बन सकतीं।

अन्य देशों से सीख

नेपाल और जापान जैसे देशों में, जहां भूकंप और सुनामी जैसी आपदाएं आम हैं, लापता व्यक्तियों को एक वर्ष के भीतर कानूनी रूप से मृत घोषित करने की व्यवस्था है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में भी ऐसा ही स्थायी कानूनी प्रावधान लाया जाना चाहिए।

सुझाव

  • आपदा के मामलों में लापता व्यक्ति को एक या दो वर्षों के भीतर मृत घोषित करने का कानून बने।
  • राज्यों को गजट नोटिफिकेशन के ज़रिए विशेष परिस्थिति में यह अधिकार मिले।
  • लापता व्यक्तियों का केंद्रीकृत डिजिटल रजिस्टर बनाया जाए जिसमें खोज और राहत की स्थिति नियमित रूप से अपडेट हो।

हर संख्या के पीछे है एक अधूरी कहानी

प्राकृतिक आपदाओं में लापता व्यक्ति केवल एक संख्या नहीं होता — वह किसी परिवार की अधूरी कहानी, किसी मां का बेटा, किसी बच्चे का पिता, किसी स्त्री का जीवनसाथी होता है। उसकी कानूनी पहचान जितनी जल्दी सुनिश्चित होगी, उतनी जल्दी उसका परिवार सामान्य जीवन में लौट पाएगा।

लापता को मृत मानने की प्रक्रिया में विलंब, न केवल कानूनी और प्रशासनिक जटिलता है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं के प्रति भी उदासीनता दर्शाती है। समय आ गया है कि इस संवेदनशील मुद्दे को गंभीरता से लिया जाए और एक दृढ़, न्यायपूर्ण और मानवीय नीति बनाई जाए।

Yogi Varta

Yogi Varta

Related articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *