सनातन और संविधान का साझा संदेश: संयम, समावेश और संतुलन

सनातन और संविधान का साझा संदेश: संयम, समावेश और संतुलन

उत्तराखंड के कोटद्वार में हाल के दिनों में धर्म के आधार पर चल रही छीटाकशी, चाहे वह किसी भी पक्ष से हो — समाज में उन्माद, अविश्वास और वैमनस्य को जन्म दे रही है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि इस घटनाक्रम का असर पूर्व सैनिक समुदाय पर भी पड़ रहा है, जो अब तक अनुशासन, संयम और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक रहा है। यह स्थिति केवल सामाजिक चिंता नहीं,
बल्कि संवैधानिक और सांस्कृतिक चेतावनी है।

पूर्व सैनिकों के रूप में हमने जिस भारत की सेवा की, वह किसी एक धर्म, जाति या पहचान का नहीं था। वह भारत बहुलता में एकता का भारत था, जहां विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उन्माद के शोर में विवेक की आवाज़ को पहचानें और उसे बुलंद करें।

सनातन संस्कृति: सहिष्णुता नहीं, स्वीकार्यता

अक्सर यह कहा जाता है कि सनातन संस्कृति ‘अन्य धर्मों को सहन करती है।’ यह कथन अधूरा है। सनातन परम्परा केवल सहिष्णु नहीं, बल्कि स्वीकारक रही है। सहिष्णुता में दूरी छिपी होती है ‘मैं तुम्हें झेल रहा हूं।’ स्वीकार्यता में अपनापन होता है — ‘तुम भी सत्य की खोज में मेरे साथ हो।’

उपनिषदों का उद्घोष, ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ (ऋग्वेद) — सिर्फ धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि सभ्यता का आधार है। इसका अर्थ यह नहीं कि सब रास्ते एक जैसे हैं, बल्कि यह कि सत्य तक पहुंचने के मार्ग अनेक हो सकते हैं। इसी स्वीकार्यता ने भारत को वह भूमि बनाया जहां यहूदी, पारसी, ईसाई, इस्लाम, सभी ने शरण और सम्मान पाया।

सनातन का मूल आग्रह आचरण पर है, पहचान पर नहीं। धर्म (कर्तव्य), अहिंसा, करुणा, संयम, ये मूल्य किसी एक समुदाय की बपौती नहीं। जब सनातन को संकीर्ण पहचान में कैद किया जाता है, तब वह अपने ही मूल से कट जाता है।

संविधान: आधुनिक भारत का नैतिक संहिता-पत्र

भारत का संविधान कोई विदेशी विचार नहीं, बल्कि हमारी सभ्यतागत चेतना का आधुनिक रूपांतरण है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि धर्म-समभाव है, राज्य सभी आस्थाओं से समान दूरी और समान सम्मान रखे।

पूर्व सैनिकों ने जिस संविधान की शपथ ली उसने हमें सिखाया कि राज्य का काम आस्था थोपना नहीं, अधिकार सुरक्षित करना है। अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, और अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता, पर, यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

यानी, अधिकार के साथ उत्तरदायित्व। जब धर्म के नाम पर उन्माद फैलता है, तो संविधान ही वह ढाल है जो समाज को टूटने से बचाती है।

पूर्व सैनिक: उन्माद नहीं, संतुलन का प्रतीक

पूर्व सैनिकों की पहचान लाठी या नारे से नहीं, विवेक और अनुशासन से होती है। हमने सीखा है कि भावनाएं नियंत्रित हों, आदेश विवेकपूर्ण हों, और शक्ति का प्रयोग अंतिम विकल्प हो।

धर्म के नाम पर छीटाकशी, चाहे सोशल मीडिया पर हो या सड़क पर, हमारे उस प्रशिक्षण के विपरीत है जिसमें स्थिति का आकलन, तनाव का शमन, और नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि रहती है। यदि पूर्व सैनिक स्वयं बंटेंगे, तो समाज को जोड़ने का नैतिक अधिकार कौन निभाएगा?

उन्माद की राजनीति और समाज का दायित्व

इतिहास गवाह है, जब भी धर्म को राजनीतिक औज़ार बनाया गया, समाज ने कीमत चुकाई। उन्माद तात्कालिक उत्तेजना देता है, स्थायी समाधान नहीं।
समाधान आता है, संवाद से, कानून से, और नैतिक नेतृत्व से।

कोटद्वार जैसी घटनाओं में आवश्यक है कि कानून अपना काम बिना किसी पक्षपात के करे। नेतृत्व संयम दिखाए, उकसावे से बचे समुदाय संवाद बढ़ाएं, अफवाह से नहीं, तथ्य से।

सनातन और संविधान: विरोध नहीं, पूरक

यह एक भ्रम है कि सनातन और संविधान एक-दूसरे के विरोधी हैं। सत्य इसके उलट है। सनातन आत्मा का अनुशासन सिखाता है; संविधान सत्ता का अनुशासन।

दोनों का संगम ही भारत की स्थिरता है। जब सनातन का करुणा-सिद्धांत संविधान के समानता-सिद्धांत से मिलता है, तब न्याय जन्म लेता है। जब सनातन का संयम संविधान की स्वतंत्रता से जुड़ता है, तब संतुलन बनता है।

विभाजन नहीं, विवेक चुनें

आज आवश्यकता इस बात की है कि पूर्व सैनिक उन्माद का हिस्सा नहीं, समाधान का केंद्र बनें। हम न किसी धर्म के विरुद्ध हैं, न किसी आस्था के। हम संविधान के पक्ष में और सनातन की मूल भावना—स्वीकार्यता के साथ हैं।

आइए, कोटद्वार की घटना से सीख लें, कि छीटाकशी से नहीं, संयम से समाज बचता है। कि पहचान से नहीं, आचरण से राष्ट्र बनता है। विवेक ही सच्चा शौर्य है। संयम ही सच्चा धर्म और संविधान, हम सबका साझा संकल्प।

ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त (पहाड़ी) डंगवाल

Yogi Varta

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