जीत सिंह नेगी के गीतों में पहाड़ की सतत पीड़ा

जीत सिंह नेगी के गीतों में पहाड़ की सतत पीड़ा

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

बहुआयामी प्रतिभा के धनी जीत सिंह नेगी (जन्म: 2 फ़रवरी 1925, उत्तराखंड) ऐसे पहले लोकगायक थे जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड वर्ष 1949 में जारी हुआ। उन्होंने दो हिंदी फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में भी कार्य किया। वे संगीतकार, रंगकर्मी और पर्वतीय संस्कृति एवं भाषा के समर्पित उपासक थे।

गढ़वाली लोकगीतों के प्रख्यात रचनाकार तथा सुप्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपरा के ऐसे नक्षत्र हैं, जिन्होंने लोकसंस्कृति के आकाश में निरंतर उजास बिखेरा। ‘गढ़वाली सहगल’ जैसी उपमा से अलंकृत नेगी जी ने पर्वतीय संस्कृति, भाषा, लोकगीत, लोकगाथा, लोकनृत्य और लोकसंगीत जैसी स्वस्थ परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अपना जीवन समर्पित कर दिया।

उन्होंने पर्वतीय जनजीवन को अपने सृजित गीतों, नृत्य-नाटिकाओं और गीत-नाटकों के माध्यम से अत्यंत मार्मिक, सजीव और प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त किया। उनका गीत-संगीत का यह स्वर्णिम सफर छात्र जीवन से प्रारंभ हुआ, जब सन् 1942 में पौड़ी से उन्होंने स्वरचित गढ़वाली गीतों का सफल गायन किया। अपनी आकर्षक और सुरीली धुनों में लोकगीत गाकर वे शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए।

सन् 1949 उनके जीवन का निर्णायक वर्ष सिद्ध हुआ, जब किसी गढ़वाली लोकगायक के रूप में सर्वप्रथम यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने उन्हें मुंबई आमंत्रित किया। वहाँ उनके छह गीतों की रिकॉर्डिंग हुई, जो अत्यंत लोकप्रिय हुए और कला-जगत में सराहे गए।

सन् 1952 में गढ़वाल भ्रातृ मंडल, मुंबई के तत्वावधान में जीत सिंह नेगी ने नाटक ‘भारी भूल’ का सफल मंचन किया। इसके पश्चात 1954–55 में हिमालय कला संगम, दिल्ली के मंच से इसी नाटक का निर्देशन एवं मंचन किया गया।

गढ़वाल के इतिहासपुरुष टिहरी नरेश के सेनापति माधो सिंह भंडारी द्वारा मलेथा गाँव में कूल (सिंचाई नहर) निर्माण की रोमांचक घटना पर आधारित नाटक ‘मलेथा की कूल’ की रचना उन्होंने की, जिसका मंचन 1970 में देहरादून में हुआ। इसके अतिरिक्त गढ़वाली लोककथाओं के प्रसिद्ध नायक, बाँसुरी वादक जीतू बगड़वाल के जीवन पर आधारित गीत-नृत्य नाटक ‘जीतू बगड़वाल’ का मंचन क्रमशः 1984 में देहरादून तथा 1987 में चंडीगढ़ में किया गया।

स्वरचित गढ़वाली गीतों को अपनी मधुर, प्रेरक वाणी में गाकर पहाड़ी संस्कृति की ओर संगीत-जगत का ध्यान आकर्षित करने का श्रेय सर्वप्रथम जीत सिंह नेगी को ही जाता है। उनका गीत ‘तू होली ऊँची डाँड्यूँ मा, बीरा घसियारी का भेष मा’ भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग द्वारा सन् 1961 में सर्वप्रिय लोकगीत के रूप में उल्लेखित किया गया।

‘रामी’ और ‘राजू पोस्टमैन’ जैसी भावप्रवण गीत-नाटिकाओं एवं एकांकी प्रस्तुतियों ने उन्हें व्यापक ख्याति दिलाई। उनके कई गीत-नाटिका आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली और लखनऊ से प्रसारित हुए। ‘रामी’ का हिंदी रूपांतरण दिल्ली दूरदर्शन से भी प्रसारित हुआ।

जीत सिंह नेगी की अनेक रचनाओं पर चलचित्र बनाए गए। सन् 1957 में एच.एम.वी. तथा 1964 में कोलंबिया ग्रामोफोन कंपनी के लिए उन्होंने स्वरचित आठ गढ़वाली गीतों को अपनी मधुर आवाज दी, जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। चर्चित गढ़वाली फिल्म ‘मेरी प्यारी बोई’ के गीत-संवादों के माध्यम से भी उन्होंने अपनी सशक्त छाप छोड़ी।

प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी को ‘लेजेंडरी सिंगर’ सम्मान से नवाजा गया। इसी अवसर पर लोकगायक चंद्र सिंह राही को ‘यंग उत्तराखंड लाइफटाइम अचीवमेंट’ सम्मान प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त संस्कृति विभाग द्वारा उनके गीतों का संकलन पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया, जो उनके योगदान का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

‘म्यारा गीत’ नामक इस पुस्तक में 1950 और 1960 के दशक में गाए गए उनके गीत संकलित हैं, जो अपने समय में गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय रहे। इन्हें उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी माना जाता है।

गढ़वाल के प्राचीन और आधुनिक परिवेश में सामाजिक सरोकारों, राजनीतिक आकांक्षाओं तथा धार्मिक विचारों को नाटक एवं गीतों में पिरोकर अभिव्यक्त करने में नेगी जी का कोई सानी नहीं है। गढ़वाली लोकगीतों के स्वर, ताल और लय पर शोध करने वालों के लिए वे एक अनुपम उदाहरण हैं।

सम्मानों और पुरस्कारों की श्रृंखला तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थाओं से उनकी संबद्धता ही उनकी ख्याति को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है। आज के गीतकारों और संगीतज्ञों के लिए वे सदैव प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। यदि उन्हें गढ़वाली गीतों का ‘गॉडफादर’ कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

आज भी उनकी वाणी में वही मधुरता और ओज विद्यमान है, जो श्रोताओं को प्रेरित करता है। उनका एक प्रसिद्ध लोकगीत, जिसे बाद में गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने स्वर दिया—
“घास काटी की प्यारी छैला ये,
रुमुक ह्वेगे घार ऐ जादी…”
आज भी लोकमानस में जीवित है।

इसी प्रकार “तू होली ऊँची डाँड्यों मा बीरा, घसियारी का भेष मा…” जैसे गीत पहाड़ की विरह-वेदना और प्रवासी मन की पीड़ा को गहराई से अभिव्यक्त करते हैं।

जीत सिंह नेगी 1950 के दशक की शुरुआत में ऐसे पहले गढ़वाली लोकगायक थे, जिनके गीतों का सर्वप्रथम ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ। यह उनके ऐतिहासिक योगदान का महत्वपूर्ण अध्याय है।

लेखक विज्ञान एवं तकनीकी विषयों के जानकार हैं तथा दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

Yogi Varta

Yogi Varta

Related articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *