‘किताब वाला दोस्त’ बना युवाओं की प्रेरणा
देहरादून के योगेश बिष्ट एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी करते हैं, लेकिन उन्होंने सिर्फ नौकरी तक खुद को सीमित नहीं रखा। पढ़ने-पढ़ाने के शौक ने उन्हें ‘किताब वाला दोस्त’ नाम की एक अनोखी पहल शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
इस मुहिम के तहत वे शहर के अलग-अलग चौराहों और सड़कों किनारे किताबों का स्टाल लगाते हैं, जो हर शनिवार-रविवार कहीं भी दिखाई दे सकता है।
योगेश का मानना है कि किताबें सिर्फ ज्ञान नहीं देतीं, बल्कि जीवन बदलने की ताकत रखती हैं। उनकी यह छोटी सी शुरुआत अब धीरे-धीरे लोगों के बीच लोकप्रिय हो रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस पहल से उन्हें अच्छा खासा आर्थिक लाभ भी हो रहा है, जिससे यह एक स्थायी आय का स्रोत बनता जा रहा है।
वे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और साथ ही किताबों की बिक्री के जरिए एक मजबूत पहचान बना रहे हैं। उनका यह प्रयास दिखाता है कि अगर सोच अलग हो, तो नौकरी के साथ भी नए अवसर बनाए जा सकते हैं।
आज के समय में जब मोबाइल और सोशल मीडिया ने पढ़ने की आदत को कम कर दिया है, योगेश जैसे प्रयास लोगों को फिर से किताबों की ओर आकर्षित कर रहे हैं। उनका स्टाल सिर्फ किताब बेचने का स्थान नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का एक छोटा सा मंच बनता जा रहा है।
कई युवा उनके पास आकर न सिर्फ किताबें खरीदते हैं, बल्कि करियर, पढ़ाई और जीवन से जुड़ी बातें भी करते हैं। इस तरह ‘किताब वाला दोस्त’ एक दोस्त की तरह लोगों के बीच अपनी जगह बना रहा है।
योगेश की सोच साफ है — अगर आप कुछ अलग करना चाहते हैं, तो छोटे स्तर से ही शुरुआत करें। धीरे-धीरे यही छोटी शुरुआत बड़े बदलाव का कारण बनती है।
उत्तराखंड के युवाओं को योगेश से सीखने की जरूरत है कि मौके इंतजार करने से नहीं मिलते, उन्हें खुद बनाना पड़ता है। आज जब कई युवा सिर्फ नौकरी की तलाश में हैं, योगेश जैसे लोग खुद रास्ता बना रहे हैं।
उनकी यह पहल यह भी सिखाती है कि शौक को अगर सही दिशा दी जाए, तो वही कमाई का जरिया बन सकता है। ‘किताब वाला दोस्त’ अब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक सोच और एक आंदोलन बनता जा रहा है।
अगर आप देहरादून में कहीं सड़क किनारे किताबों का छोटा सा स्टाल देखें, तो रुकिए, बातचीत कीजिए और एक किताब जरूर खरीदिए। यकीन मानिए, यह पहल न सिर्फ पढ़ने की आदत बढ़ाएगी, बल्कि एक युवा के सपनों को भी मजबूती देगी।

