बच्चों के अभिनय से जीवंत हुई उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति
करीब 104 साल पहले उत्तराखंड की धरती पर अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा अहिंसक आंदोलन हुआ था। नाम था कुली बेगार आंदोलन, जिसकी सफलता से महात्मा गांधी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। इसी आंदोलन ने उत्तराखंड के जनमानस को अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए जागृत करने का काम किया।
इसी ऐतिहासिक आंदोलन को मयूर विहार के कार्त्यायनी सभागार में नन्हें कलाकारों ने मंचित कर इस आंदोलन की यादें ताजा कर दीं। कुमाऊंनी भाषा में मंचित ‘झन दिया कुली बेगार’ नाम के इस नाटक का मंचन 25 जून को हुआ।
इसका आयोजन गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी अकादमी, दिल्ली सरकार की ओर से किया गया। बता दें कि अकादमी की ओर से गर्मियों की छुट्टी में स्कूली बच्चों के लिए बाल नाट्य कार्यशालाएं आयोजित की गई थीं।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
नाटक की निर्देशिका मीना पांडेय के मुताबिक, कुली बेगार आंदोलन की यह कहानी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है कि कैसे अहिंसक तरीके से शोषण के खिलाफ लड़ा जा सकता है। उन्होंने विशेष रूप से बच्चों को इस ऐतिहासिक घटना से रू—ब—रू कराने पर जोर दिया। मीना पांडेय ने कहा, यह नाटक उन महान जननायकों को याद करने का प्रयास है जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।
बाल कलाकारों की टोली
नाटक में भव्य चंद्र ने बद्री दत्त पांडे की भूमिका निभाई, जबकि दक्ष रावत ने महात्मा गांधी का चरित्र अदा किया। रक्त हीन क्रांति के इस मंचन में सार्थक नेगी, तनाया नेगी, नेहा, शनाया चौधरी, सृजय पांडेय समेत 20 से अधिक बाल कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को इस ऐतिहासिक आंदोलन की कहानी बताई।
संगीत संयोजन जीवन चंद्र कलखुंडिया और मेकअप हरी खोलिया का था। खचाखच भरे सभागार में मौजूद गढ़वाली कुमाऊंनी जौनसारी अकादमी के राजू तिवारी, पर्वतीय कला केंद्र के केएस बिष्ट और कई गणमान्य व्यक्तियों ने इस रक्तहीन क्रांति के मंचन की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

