जब पहाड़ों ने खुद को बचाना शुरू किया
मोहन चंद्र कांडपाल और उत्तराखंड में जल की वापसी की एक असाधारण कहानी
नक्शों में मौजूद लेकिन ज़मीन से गायब होती नदियां, सूखते नौले, खाली होते गांव और पलायन की मजबूरी—उत्तराखंड के पहाड़ पिछले कुछ दशकों से इसी त्रासदी को जी रहे हैं। जहां पानी कभी जीवन का आधार था, वहीं अब वह संघर्ष का कारण बन चुका था। ऐसे समय में बदलाव किसी सरकारी घोषणा या बड़े आंदोलन से नहीं आया, बल्कि एक शांत, धैर्यपूर्ण और ज़मीनी प्रयास से शुरू हुआ। इस बदलाव का नाम है — मोहन चंद्र कांडपाल।
कांडपाल ने पहाड़ों की समस्या को बाहर से नहीं, भीतर से समझने की कोशिश की। उन्होंने यह सवाल उठाया कि आखिर पहाड़ों में पानी क्यों खत्म हो रहा है, जबकि बारिश आज भी होती है। जवाब किसी मौसम रिपोर्ट में नहीं, बल्कि पहाड़ों की टूटी हुई परंपराओं में छिपा था। कभी यहां की धरती बारिश की हर बूंद को थाम लेती थी — खाल, नौले, जंगल और ढलान मिलकर पानी को सहेजते थे। समय के साथ यह समझ टूट गई और पानी पहाड़ों से फिसलकर बहने लगा।
इसी टूटे हुए रिश्ते को फिर से जोड़ने का काम कांडपाल ने शुरू किया। उनका मंत्र था — ‘पानी बोओ’। यह कोई नारा भर नहीं, बल्कि जल सुरक्षा की एक दीर्घकालिक सोच थी। बरसात की हर बूंद को रोकना, उसे रिसने देना और धरती के भीतर पहुंचाना — यही उनकी कार्यपद्धति बनी। वर्षों की मेहनत से खाल बने, परंपरागत नौले फिर से जागे और रिस्कन नदी, जिसे लोग लगभग भूल चुके थे, दोबारा बहने लगी।
यह यात्रा किसी एक व्यक्ति की नहीं थी। कांडपाल ने गांवों को साथ जोड़ा, स्थानीय ज्ञान को सम्मान दिया और श्रमदान की परंपरा को फिर से जीवित किया। जहां कई सरकारी योजनाएं कागज़ों और प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाती हैं, वहां सामुदायिक भागीदारी ने काम को ज़मीन पर उतारा। जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण, ढलानों पर सही जगहों पर छोटी संरचनाएं और स्थानीय वनस्पति का संवर्धन — इन सबने मिलकर पहाड़ों के जलचक्र को दोबारा सांस लेने लायक बनाया।
इस बदलाव का असर सिर्फ जलस्रोतों तक सीमित नहीं रहा। पानी लौटा तो खेती को सहारा मिला, पशुपालन मजबूत हुआ और पलायन की मजबूरी पर सवाल खड़े होने लगे। महिलाओं की रोज़मर्रा की मेहनत कम हुई, खेतों में फिर से भरोसा लौटा और गांवों में भविष्य की उम्मीद जगी। यह विकास का वही रूप था, जो आंकड़ों से नहीं, जीवन से मापा जाता है।
देश ने इस शांत लेकिन गहरे असर वाले प्रयास को पहचाना। मोहन चंद्र कांडपाल को मिला छठा राष्ट्रीय जल पुरस्कार केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस सोच की स्वीकृति है जो कहती है कि समाधान स्थानीय हों, सहभागिता से हों और प्रकृति के साथ तालमेल में हों। यह कहानी नीति-निर्माताओं के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है—कि बड़े बजट से पहले छोटी, टिकाऊ और समुदाय-आधारित पहलें कहीं अधिक दूर तक असर करती हैं।
उत्तराखंड की यह पहल हमें याद दिलाती है कि पहाड़ों का संकट पहाड़ों की समझ से ही सुलझेगा। जब परंपरा, विज्ञान और सामुदायिक इच्छाशक्ति एक साथ आती हैं, तब परिवर्तन केवल संभव ही नहीं होता—वह टिकाऊ भी बनता है।
शायद इसी वजह से यह कहानी सिर्फ पानी की वापसी की नहीं, बल्कि उम्मीद की वापसी की कहानी है। क्योंकि बदलाव सचमुच पहाड़ों से ही शुरू होता है।

