क्या उत्तराखंड संभाल पाएगा बढ़ती भीड़ का दबाव?

क्या उत्तराखंड संभाल पाएगा बढ़ती भीड़ का दबाव?

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, अपनी आध्यात्मिक विरासत, हिमालयी सौंदर्य और जैव विविधता के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है।

बीते कुछ वर्षों में यहां पर्यटन अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। चारधाम यात्रा, हिल स्टेशनों, ट्रेकिंग मार्गों और प्राकृतिक स्थलों पर रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं। पहली दृष्टि में यह आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सकारात्मक प्रतीत होता है। स्थानीय रोजगार बढ़ता है, होटल उद्योग सक्रिय होता है और राज्य की आय में वृद्धि होती है।

परंतु प्रश्न यह है कि क्या केवल बढ़ती संख्या ही विकास का सही संकेतक है? या अब समय आ गया है कि हम पर्यटन की गुणवत्ता, प्रबंधन और स्थायित्व पर गंभीरता से विचार करें?

संख्या आधारित विकास की सीमाएं

अत्यधिक भीड़ का सीधा प्रभाव पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर पड़ता है। पहाड़ी क्षेत्रों की वहन क्षमता सीमित होती है। अनियंत्रित निर्माण, यातायात का दबाव, प्लास्टिक कचरे का बढ़ता ढेर और जल स्रोतों पर बढ़ता भार पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर कर रहा है।

धार्मिक स्थलों की गरिमा और प्राकृतिक संतुलन दोनों प्रभावित हो रहे हैं। कई स्थानों पर पार्किंग अव्यवस्थित है, कचरा प्रबंधन अपर्याप्त है और अनुशासनहीनता आम होती जा रही है।

देवभूमि की पहचान शांति, आध्यात्मिकता और स्वच्छता से है; इसे केवल भीड़-भाड़ और अव्यवस्था का प्रतीक नहीं बनने देना चाहिए।

उत्तर-पूर्व से सीख

उत्तर-पूर्व भारत के कई राज्यों ने संतुलित और जिम्मेदार पर्यटन का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

नागालैंड में आयोजित होने वाला हॉर्नबिल महोत्सव केवल भीड़ आकर्षित करने का आयोजन नहीं है, बल्कि स्थानीय जनजातीय संस्कृति, लोककला, संगीत और हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने का माध्यम है। यहां पर्यटन सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण के साथ जुड़ा हुआ है।

इसी प्रकार मेघालय ने स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी है। जीवित जड़ पुलों जैसे संवेदनशील स्थलों पर आगंतुकों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। सामुदायिक भागीदारी और प्रभावी कचरा प्रबंधन ने पर्यटन को जिम्मेदार स्वरूप प्रदान किया है।

हॉर्नबिल महोत्सव में लागू इनर लाइन परमिट व्यवस्था पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करती है, जिससे स्थानीय संस्कृति और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रह सके। वहीं सिक्कम ने स्वयं को पूर्णतः ऑर्गेनिक राज्य घोषित कर पर्यावरण–अनुकूल विकास की मिसाल पेश की है। प्लास्टिक प्रतिबंध, स्वच्छता अभियान और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी ने पर्यटन को सतत विकास से जोड़ा है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सतत पर्यटन का अर्थ केवल आर्थिक लाभ अर्जित करना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत की रक्षा और स्थानीय समुदायों के सशक्तिकरण के बीच संतुलन स्थापित करना है।

उत्तराखंड के लिए आगे की राह

यदि उत्तराखंड को दीर्घकालिक विकास सुनिश्चित करना है, तो कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं।

  • वहन क्षमता का आकलन: संवेदनशील क्षेत्रों में प्रतिदिन आने वाले पर्यटकों की सीमा निर्धारित की जाए।
  • डिजिटल पंजीकरण और ट्रैकिंग: यात्रा मार्गों पर अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए।
  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी: होम-स्टे, स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक हस्तशिल्प और जैविक कृषि को पर्यटन से जोड़ा जाए।
  • कचरा और प्लास्टिक प्रबंधन: स्रोत पर कचरा पृथक्करण और सख्त दंड व्यवस्था लागू हो।
  • सतत अवसंरचना विकास: पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के आधार पर ही नए निर्माण की अनुमति दी जाए।
  • जागरूकता अभियान: पर्यटकों को जिम्मेदार व्यवहार के लिए प्रेरित किया जाए— ‘टेक बैक योर वेस्ट’ जैसी पहलें लागू हों।

सतत पर्यटन कोई वैकल्पिक नीति नहीं, बल्कि पहाड़ी राज्यों के लिए अनिवार्यता है। यदि विकास केवल संख्या पर आधारित होगा, तो प्राकृतिक संसाधन और सांस्कृतिक पहचान दोनों खतरे में पड़ सकते हैं। परंतु यदि नीति गुणवत्ता, अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित होगी, तो आर्थिक समृद्धि और प्रकृति संरक्षण साथ-साथ संभव हैं।

आज आवश्यकता दूरदर्शी नीति, कठोर क्रियान्वयन और जनसहभागिता की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी हिमालय की पवित्रता और उत्तराखंड की अनुपम प्राकृतिक सुंदरता को उसी गरिमा और संतुलन के साथ अनुभव कर सकें।

Yogi Varta

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