सीमा के रक्षक क्या अब बनेंगे व्यवस्था के प्रहरी ?

सीमा के रक्षक क्या अब बनेंगे व्यवस्था के प्रहरी ?

– ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त ‘पहाड़ी’ डंगवाल

लोकतंत्र की आत्मा जनता के विश्वास और आस्था पर टिकी होती है। यह विश्वास तब टूटता है जब सत्ता के गलियारों से ऐसे बयान सामने आते हैं, जो हमारे राजनीतिक तंत्र के भीतर की गहरी सड़ांध को उजागर कर देते हैं।

हाल ही में पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि उत्तराखंड में सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी की पार्टी फंडिंग खनन माफिया की काली कमाई से होती रही है।

उन्होंने यह भी स्वीकारा कि स्वयं उन्होंने एक करोड़ रुपये खनन माफिया से लिए, वह भी दस-दस लाख के चेकों के माध्यम से। यह खुलासा केवल एक व्यक्ति या एक दल के भ्रष्ट आचरण का उदाहरण नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के पतन की गवाही है।

भ्रष्टाचार का यह वीभत्स चेहरा

भारतीय जनता पार्टी, जो स्वयं को नैतिकता, राष्ट्रवाद और ईमानदारी की कसौटी पर सबसे ऊपर बताती रही है, अब उसके शीर्ष नेताओं के खिलाफ ऐसे आरोप उसके ही वरिष्ठ नेताओं की ज़ुबानी सामने आए हैं।

सवाल यह है कि अगर प्रवर्तन निदेशालय (ED), CBI या किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए, तो क्या कई बड़े नेता जेल की सलाखों के पीछे नहीं होंगे?

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है क्या कभी निष्पक्ष जांच होगी? या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह सत्ता और विपक्ष की मिलीभगत के जाल में दबा दिया जाएगा?

जनता की मजबूरी या मूर्खता?

यह तथ्य जितना कड़वा है, उतना ही निर्विवाद भी, जनता बार-बार इन दोनों राष्ट्रीय दलों के झूठे वादों में फंसती रही है। कभी रामराज्य का सपना दिखाया गया, कभी विकास का, कभी बेरोजगारी मिटाने का वादा हुआ, तो कभी पलायन रोकने का।

लेकिन नतीजा क्या निकला? पहाड़ आज भी उजाड़ हैं, गांव खाली हो रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं अब भी बदहाल हैं। युवाओं को नौकरी नहीं, केवल ठेके और पलायन की मजबूरी मिली है।

किसान आज भी बिचौलियों के चंगुल में हैं। और सबसे गंभीर बात प्रदेश की प्राकृतिक संपदा: जल, जंगल, जमीन, खनन माफिया और राजनीतिक दलालों की तिजोरियों में जा रही है। हर बार जनता को छलने का सिलसिला जारी है। यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, यह लोकतंत्र की हत्या है।

खनन माफिया से फंडिंग

खनन माफिया से पैसा लेकर पार्टी फंडिंग करना सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, यह लोकतंत्र की आत्मा के साथ बलात्कार है। जब फंडिंग माफिया से होगी, तो नीतियां भी माफिया के हित में बनेंगी।

जब नेता सौदेबाजी में उतरेंगे, तो फैसले जनता की भलाई के लिए नहीं होंगे। जब चुना हुआ जनप्रतिनिधि माफिया की कठपुतली बन जाए, तब समझ लीजिए, लोकतंत्र केवल एक दिखावा रह गया है।

अब सवाल जनता से है, हरक सिंह रावत का बयान हमें सिर्फ क्रोध नहीं, आत्ममंथन के लिए भी मजबूर करता है। आखिर क्यों हम बार-बार उन्हीं दलों को चुनते हैं जिनका इतिहास भ्रष्टाचार और धोखे से भरा हुआ है?

क्या हमें मान लेना चाहिए कि लोकतंत्र सिर्फ बड़े दलों की बपौती है? क्या छोटे और ईमानदार विकल्प कभी खड़े ही नहीं हो सकते?

उत्तराखंड को बचाने का एक ही रास्ता: राजनीतिक विकल्प

अब भावनाओं में बहने का नहीं, ठोस कदम उठाने का समय है। अगर हम सच में उत्तराखंड और अपने बच्चों का भविष्य बचाना चाहते हैं, तो हमें इन राष्ट्रीय दलों की दोगली राजनीति को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा।

इसके लिए ज़रूरी है कि उत्तराखंड की जनता, विशेष रूप से सैनिक और अर्धसैनिक बल समुदाय, जो अनुशासन, ईमानदारी और बलिदान के प्रतीक हैं, आगे आएं।

सैनिक समुदाय का दायित्व

सैनिक जानते हैं, ईमानदारी क्या होती है, अनुशासन क्या होता है, और राष्ट्रहित सर्वोपरि कैसे होता है। अगर सैनिक सीमा की रक्षा कर सकता है, तो राजनीति की भी रक्षा कर सकता है।

अगर वह दुश्मन की गोली झेल सकता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज भी उठा सकता है। अगर वह प्राणों की आहुति दे सकता है, तो सत्ता के लोभ से ऊपर उठकर जनता की सेवा भी कर सकता है।

अब समय है कि सैनिक समुदाय राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में आगे आए और जनता को यह विश्वास दिलाए कि अब की बार केवल चेहरे नहीं, व्यवस्था बदलेगी।

अब नहीं चेते, तो खो देंगे उत्तराखंड

इतिहास गवाह है जब समाज अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होता है, तब क्रांतियां जन्म लेती हैं। उत्तराखंड स्वयं एक आंदोलन से जन्मा राज्य है। लेकिन आज यह राज्य अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुका है।

अगर अब भी हम चुप रहे, अब भी हम उन्हीं चालाक दलों की चाल में फंसे रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। वे पूछेंगी, जब भ्रष्टाचार खुलेआम स्वीकार किया गया, तब तुमने क्या किया?

जब लोकतंत्र खतरे में था, तब तुम क्यों चुप रहे? जब बदलाव का अवसर था, तब तुम क्यों नहीं उठे? और तब हमारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।

उत्तराखंड की जनता से यही कहना है, अब समय आ गया है कि हम अपनी नियति खुद लिखें। राष्ट्रीय दलों से मुक्ति पाकर, सैनिकों और ईमानदार नागरिकों के नेतृत्व में एक नए राजनीतिक विकल्प को जन्म दें। यह विकल्प केवल सत्ता पाने का नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा को बचाने का संकल्प होगा।

यह विकल्प केवल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक भ्रष्टाचारमुक्त, भयमुक्त और पलायनमुक्त समाज देने का वादा होगा।

हरक सिंह रावत का बयान केवल एक खुलासा नहीं, बल्कि लोकतंत्र को भीतर से खोखला करने वाली सच्चाई का पर्दाफाश है। अब यह जनता पर है कि वह क्या चुनती है: भ्रष्ट दलों की मिलीभगत और माफियाओं का शिकंजा, या ईमानदारी, अनुशासन और बलिदान की नींव पर खड़ा एक नया उत्तराखंड।

अगर हम अब नहीं चेते, तो हम खो देंगे उत्तराखंड और खो देंगे लोकतंत्र।

— यह लेखक के अपने विचार हैं।

Yogi Varta

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